Wednesday, January 20, 2010

थोड़ी "आस्था" मार्क्सवाद में भी तो हो...!

केरल के पूर्व सीपीएम सांसद कुरिसिंकल एस मनोज को व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था प्रकट/अभिव्यक्त करने के लिए पार्टी की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। पश्चिम बंगाल से निकलने वाले अखबार "दि टेलीग्राफ" (11जनवरी 2010) ने लिखा, ‘मार्क्सिस्ट पुट्स गॉड एवव पार्टी।’ यह भी बताया जा रहा है कि पार्टी के अंदर इस बात को लेकर एक पुरानी बहस चल रही है कि धर्म के बारे में पार्टी सदस्य का क्या रुख हो।

अव्वल तो यह कि केवल मार्क्र्सवाद या मार्क्र्सवादी पार्टियों से इस मसले को जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए, और न ही इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीजों से जोड़ा जा सकता है। सवाल यह है कि ऐसे लोगों को, जिनकी दृष्टि प्रगति-विरोधी और अवैज्ञानिक समझ पर आधारित हो, क्या कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया जाना चाहिए? कहना होगा कि आज कम्युनिस्ट पार्टियां भी ठीक उसी तरीके से अपना सदस्य बनाती हैं जैसे राजद या राजग। (ये दो नाम तो केवल सुविधा के लिए दिये गए हैं)सिद्धांत में चाहे जो हो, व्यवहार में विचारधारा से ज्यादा दूसरी ही चीजों का ध्यान रखा जाता है।

सदस्य बनने वाले भी सतर्क/जागरूक रहते हैं। पार्टी का बाजार-भाव पता करते रहते हैं। उन्हें मालूम रहता है कि फिलहाल कौन-सी राजनैतिक पार्टी नौकरी प्रदान करने में सक्षम है। हालांकि यह मजाक की तरह लगेगा, लेकिन सच है कि लोग रातोंरात अपनी वैचारिक लाइन बदल लेते हैं। उनकी प्रतिबद्धता नौकरी के प्रति है। जो पार्टी पहले नौकरी दे-दिला देगी, उस पार्टी की सदस्यता वे पहले स्वीकार करेंगे। दिल्ली के मित्र बताते हैं कि विश्वविद्यालय तक की नियुक्तियों में इन पार्टियों का अघोषित कोटा होता है। ऐसे लोग पार्टी की आय का जरिया बनते हैं। जहां महज लेवी और चंदे की वसूली को ध्यान में रख कर सदस्य बनाए जाते हों, वहां ऐसी बहसों के लिए कोई स्पेस है क्या?

नब्बे के दशक में पटना के मार्क्र्सवादी छात्र-संगठनों में तीन चेहरे मुझे अक्सर सड़कों पर नारे लगाते दिखते-अपूर्वानंद, निवेदिता और नीरज। कहना होगा कि तीनों ही काफी सक्रिय और प्रतिबद्ध थे। मेरे छात्र-जीवन के नायक। अपूर्वानंद ने अशोक वाजपेयी का दामन पकड़ा। शायद ही अपूर्वानंद को याद हो कि वे कभी ‘वाजपेयी हटाओ, भारत भवन बचाओ’ की रट लगाया करते थे। उनके साथ काम करने वाले नीरज आज नीतीश के तलुवे चाट रहे हैं कि सहला रहे हैं। निवेदिता फिर भी इन सब से ठीक रही।

नीरज को आरक्षण-विरोध के नाम पर पार्टी से निकाला गया था। हालांकि वे अकेले आरक्षण-विरोधी कामरेड नहीं थे, जिनको पार्टी की सदस्यता गंवानी पड़ी। ऐसे कई नाम हैं। अपूर्वानंद को पार्टी से निकाला नहीं गया, बल्कि एक लंबे समय में पार्टी का उपयोग करते हुए वे पार्टी से ऊपर की चीज हो गए। ये और बात है कि अब भी वे अपने को पार्टी के सदस्य के रूप में यदा कदा प्रचारित करते हैं। यहीं यह भी जोड़ दें कि लालू प्रसाद यादव ने जब अपना दल बनाया और उसकी हवा बही तो बिहार की सभी कम्युनिस्ट पार्टियों के यादव कामरेडों ने उनके साथ अपने को जोड़ लिया। क्या वजह है कि उनका यादव होना उनके वामपंथ पर भारी पड़ गया? क्या नीरज जैसे ‘क्रांतिकारी’ छात्र-नेता का हृदय-परिवर्तन बुद्ध की तरह केवल एक घटना से हुआ?


दरअसल इन बातों पर हम केवल तभी बहस करते हैं जब कोई अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की वजह से पार्टी छोड़ देता है, या फिर जब किसी को पार्टी से निकाला जाता है। बिहार की एक कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने एक महत्वपूर्ण दस्तावेज में जाति के महत्व को सिद्धांत रूप में न सही चुनावी स्ट्रेटेजी के बतौर साफ-साफ शब्दों में स्वीकार किया है। इस स्ट्रेटेजी का मतलब होता है कि मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र में पार्टी मुस्लिम प्रत्याशी खड़ी करेगी और और यादव इलाके से यादव प्रत्याशी। अगर ऐसी स्थिति है तो अपने निजी जीवन में स्ट्रेटजी के तहत ही किसी को यादव या कुर्मी बनने या बने रहने की छूट पार्टी क्यों नहीं दे सकती? हालांकि इस बात की तो कोई बहस ही नहीं है क्योंकि अपने निजी जीवन में हम कम्युनिस्टों की पहचान जाति से पहले होती है, विचारधारा तो बाद की, दुकान सजाने/चलाने की चीज है।


मजे की बात है कि कुरिसिंकल एस मनोज महज एक कम्युनिस्ट ही नहीं हैं, उनका ताल्लुक चिकित्सा विज्ञान से भी रहा है। यह तथ्य भारतीय चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों की समझ की भी पोल खोलता है। मेडिकल सायंस की आखिर कौन-सी शिक्षा उन्होंने हासिल की कि "भगवान की लीला" को वे समझने में अब तक असमर्थ रहे।

विज्ञान और मार्क्सवाद दोनों ही की विचार-पद्धति अंधविश्वास-विरोधी है। पचास साल की उम्र तक अगर एक कम्युनिस्ट और चिकित्सा विज्ञान से जुड़े व्यक्ति को धर्म की निस्सारता समझ में न आती हो तो क्या येचुरी केवल यह कहकर कि ‘धर्म निजी आस्था की चीज है’, जिम्मेदारी से बचे रह सकते हैं?

येचुरी साहब, आपके विद्यालय का तो पहला ही पाठ है कि ‘धर्म जनता के लिए अफीम है।’ जो जनता के लिए अफीम समझ कर सर्वथा त्याज्य है, वह एक कम्युनिस्ट के लिए सर्वथा ग्राह्य कैसे हो सकता है? क्या मार्क्सवाद इसकी अनुमति देता है, येचुरी जी? क्या धर्म और भगवान की घुट्टी का ही अब एकमात्र और आसरा बचा रह गया है?

अगर ऐसा ही है तो अपने तमाम काडरों को एक-एक रामनामी चादर भी बंटवा दीजिए और आस्था के महाकुंभ में गोते लगाते रहिए। केवल अपनी व्यक्तिगत आस्था की वजह से अगर कोई डॉक्टर बजरंग बली की पूजा कर ऑपरेशन थियेटर में जाता हो तो क्या हमें उसके दिमाग के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए? शायद मेरी टर्मिनोलॉजी आपको बुरी लगे, थोड़ी ‘आस्था’(वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित विश्वास की अपेक्षा तो आपसे की नहीं जा सकती) मार्क्सवाद में भी तो हो!

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत अच्छा लगा यह आलेख पढ़ कर। सीपीआई(एम) पर तो बहुत पहले ही यह प्रश्न चिन्ह लग चुका था कि वह एक कम्युनिस्ट पार्टी रह भी गई है क्या?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

दिनेश भाई से सहमत
सीपीएम और इसके कामरेडों का आचरण देखकर अब तो इसके सामाजिक जनवादी होने पर भी शक़ होता है।

dr om prakash pandey said...

Dear Raju Ranjan ,
Don't you know that a daily dose of opium may be even life saving for some people if administered under medical supervision ? Does he think that way ?