Saturday, January 9, 2010

यह कौन-सी नई पॉलिटिकल इकोनॉमी है कॉमरेड...?

विश्वस्त कहे और समझे जा सकने वाले सूत्रों से पता चला कि कुमार मुकुल जसम यानी जन संस्कृति मंच ज्वायन कर चुके हैं। पुष्टि के लिए कुमार मुकुल को फोन लगाया। उन्होंने हामी भरी। इस पर मेरी अत्यंत सहज-स्वाभाविक (जिसे बिना सोचे बोलना कहा जा सकता है) प्रतिक्रिया थी कि ‘चलिए अच्छा है। आखिर में एक ‘अराजकतावादी’ को भी शामिल कर ही लिया।’ कुमार मुकुल ने प्रतिवाद किया, ‘लेकिन मैं सबसे कम अराजक हूं।’ मैं सोचने लगा कि आखिर वे किसकी अराजकता की बात कर रहे थे? कौन हैं वे लोग? थोड़ा आप भी सोचें।

कुमार मुकुल का जसम ज्वायन करना क्या कोई नयी और अप्रत्याशित परिघटना है? कम-से-कम न मेरे लिए, न कुमार मुकुल के लिए। हम सब उससे वैचारिक रूप से एवं संवेदना के स्तर पर हमेशा ही जुड़े रहे हैं। लेकिन पार्टी/संगठन के लिए इस तरह का जुड़ाव अब शायद कोई मायने नहीं रखता। उसे कार्ड-होल्डर लोगों पर ज्यादा भरोसा है। आप कार्ड के बगैर पार्टी या संगठन के ‘पवित्र परिवार’ में शामिल नहीं हो सकते। कार्ड के बगैर कोई ‘रिकॉग्निशन’ नहीं। ‘पहचान’ के बगैर ‘पूछ’ की आशा करना या रखना व्यर्थ है, एक तरह की अज्ञात मूर्खता, जो आपकी ‘सदिच्छा’-जनित है।

जसम से या इसके लोगों से कुमार मुकुल का जुड़ाव कोई नया नहीं है। बल्कि आप कह ले सकते हैं कि इनके सद्प्रयास या कि प्रेरणा से कई नये कहे जा सकने वाले लड़कों ने माले के साथ अपने को जोड़ा और वे लगातार कुमार मुकुल से भी उसी पुराने स्तर पर जुड़े रहे। ट्रेजेडी कि कुमार मुकुल को तब भी ‘आउटसाइडर’ का दर्जा ही नसीब हुआ। ये और बात है कि नये लड़के उनके अब भी प्रभाव में थे। सारे लोगों का साथ-साथ उठना-बैठना और बातें करना। कविता से लेकर राजनीति और फिर निजी मसलों तक पर। ऐसी अंतरंगता जो पार्टी के ‘पवित्र परिवार’ के लिए भी एक आदर्श ही हो।

इतना सब कुछ होने के बावजूद कुमार मुकुल के लिए ‘हाईकमान’ की तरफ से हरी झंडी नहीं मिली थी। नतीजतन उनकी कविताएं देश-विदेश की पत्रिकाओं में भले ही छपती रही हों, पार्टी की तथाकथित पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ में उनकी कविताओं के लिए कभी जगह न बन सकी। कई बार उनसे आग्रह कर कुछ लिखवाया भी गया, कविताएं भी ली गईं लेकिन अंततः प्रकाशित न हो सकीं। शायद ‘पार्टी-लाइन’ के लिहाज से हर बार कुछ कमी-बेशी रह जाती रही हो। वैसे यह पार्टी का अंदरूनी मामला है, इस पर किसी ऐरे-गैरे को बोलने का ‘अधिकार’ नहीं दिया जा सकता।

लेकिन संगठन में कुमार मुकुल का ‘दबाव’ रह-रह काम करते रहा। शायद इसी का नतीजा था कि जसम के लड़कों ने पटना में उनका ‘एकल काव्य-पाठ’ आयोजित कराया था। कई वर्ष पूर्व की घटना है यह। जसम के लगभग सारे लड़के तो उपस्थित थे ही। केवल एक आदमी अनुपस्थित था। उस आदमी की अनुपस्थिति कुमार मुकुल के काव्य-पाठ से ज्यादा ध्यान खींच ले रही थी। आयोजक उनके आने का भरम कार्यक्रम संपन्न होने तक बनाये रखना चाहते थे। अन्ततः वे नहीं आए। कहिए कि अन्ततः उनका नहीं आना तय था। ये जसम के सारे लड़के भी जानते थे। मैं तो इस ‘ऐतिहासिक नियति’ को मानकर ही चल रहा था। कहूं कि कुमार मुकुल को भी उस ‘अदृश्य शक्ति’ के आने को लेकर न कोई मुगालता था न दिलचस्पी। अलबत्ता कुमार मुकुल की कविता की तारीफ में आलोक धन्वा को काफी कुछ सार्वजनिक रूप से बोलते हुए सुना। मुझे भी जसम के मंच से अपनी बात रखने का पहला ही सही, मौका मिला। यह मुकुल के कवि-रूप की मेरे जानते पहली सार्वजनिक स्वीकृति थी, थोड़े-बहुत अगर-मगर के साथ।

मेरे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कुमार मुकुल ने जसम ज्वायन किया कि प्रलेस। मेरी नजरों में तो वे तब भी इन तमाम संगठनों के किसी भी पदाधिकारी से ज्यादा काम कर रहे थे। कई साल पहले जब समकालीन जनमत अपने नये रूप में छपने लगी तो उसकी बिक्री की चिंता कुमार मुकुल की निजी चिंता में शामिल हो गई। वे अपने पास सदस्यता रसीद रखते और घूम-घूमकर लोगों को वार्षिक सदस्य बनाते। मुझे भी प्रथम साल के लिए सदस्य उन्होंने ही बनाया था। अलबत्ता दूसरे साल का वार्षिक सदस्य होने से मैंने इनकार कर दिया था। इसकी दो वजहें थीं। एक तो प्रकाशक से लेकर स्वत्वाधिकारी तक में हर जगह रामजी राय का नाम था। मैंने कहा, ‘मुकुल जी, यह किसी संगठन की नहीं रामजी राय नामक एक व्यक्ति की पत्रिका लगती है। मैं इसका मेंबर होना स्वीकार नहीं कर सकता।’ दूसरी बात यह थी कि इस पत्रिका में प्रकाशित होनेवाले व्यक्ति के लिए यह जरूरी था कि वह कार्ड-होल्डर हो। अगर कार्ड-होल्डर की ही रचना छपनी थी तो मैं क्योंकर उसका ग्राहक बनता ?

जब तक कुमार मुकुल जसम के लिए ‘उत्पाद’ नहीं बन पाये, तब तक उनकी भी कोई रचना समकालीन जनमत का मुह नहीं देख सकी।

अब जाकर समझ में आया कि ‘मुह-देखाई’ की सामंती रस्म अदायगी हमारे एक्सट्रीम लेफ्टी कॉमरेडों को भी काफी पसंद है।

देखा तो नहीं, लेकिन पक्की खबर है कि दिल्ली में आयोजित जलसे के अवसर पर जसम ने जो स्मारिका प्रकाशित की है, उसमें पहली कविता कुमार मुकुल की है। अब मुकुल जसम के विधिवत् सदस्य हो चुके हैं। यह सवाल अब तक मेरे लिए अनुत्तरित है कि एक पार्टी या संगठन का सदस्य बनने न बनने से कोई तात्विक अंतर आता है क्या? क्या मुकुल कुछ-कुछ बदला हुआ महसूस करते होंगे ? उनकी कविता का ऐंगल बदल गया? क्या जसम के लोगों ने मुकुल में कोई वैचारिक कायांतरण देखा?

नहीं, तो आप ही समझाओ कि यह कौन-सी नई ‘पॉलिटिकल इकॉनॉमी’ है कॉमरेड...?

4 comments:

premranjan said...

ऐसा लगता है कि या तो आप कुमार मुकुल के साथ संवेदना के स्तर पर जुड़े होने या फिर हिंदी जगत के पाखंड से अनभिज्ञता के कारण आपको इसमें कोई पॉलिटिकल इकोनॉमी नजर आ रही है। पटना में मैं भी हूं, लेकिन पटना से लेकर दिल्ली तक की मुकुल की जो करतूतें देखने-सुनने को मिली हैं, यह लेखक संगठन क्या उससे अनजान रहा है.
जब दूसरी स्त्री से प्रेम करने और पत्नी को प्रताड़ित करने के बाद छवि का संकट पैदा हुआ, तो मुकुल ने संगठन का दामन थाम लिया। और जसम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कविता या साहित्य में तथाकथित रूप से क्रांतिकारी माना जाना वाला व्यक्ति अपने घर में किस तरह का आचरण करता है, या अपने साहित्य को किस पाखंड के साथ जीता है।
इससे तो अच्छा मुंबई का जलेस, जिसने विजयशंकर चतुर्वेदी को लगभग इसी तरह के व्यवहार के कारण बताया कि चरित्रगत दोहरेपन के साथ आपको सम्मान पाने का कोई हक नहीं है.

राजू रंजन said...

किसी को यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि कुमार मुकुल क्या प्रायः प्रत्येक जेनुइन आदमी के साथ मैं अपना संवेदनात्मक जुड़ाव महसूस करता हूं। प्रेमरंजन जी, लगता है, आपने इसी नये वर्ष में अपनी आंखें खोली हैं। वरना मुझे ऐसी नसीहतें न देते। न तो मेरे पास साहित्यकारों के कर्म-सुकर्म के आंकड़ों की कमी है, न लेखक संगठनों के(जलेस समेत)। आपकी कुण्डली नई (अलिखित) है, कि राशि-नाम ही अज्ञात है, नहीं तो इस तरह की चुनौतीपूर्ण बातें न करते। अगर आप छद्मनाम नहीं हैं, तो अपने बारे में भी पढ़ने के लिए तैयार हो जाइए। लगता है, हड़बडी में आपने गलत नंबर डायल कर दिया।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यार कामरेड
मै ज़्यादा नहीं जानता पर यह तो पक्का है कि मै जसम का मेंबर तक नहीं और मेरी कवितायें वहां छप चुकी हैं।

यही नहीं मोहन डहेरिया भी जसम से नहीं पर उनकी किताब कि मेरे द्वारा की गयी समीक्षा वहां छप चुकी है।

Anonymous said...

और काव्य पाठ में न आनेवाली वह अदृश्य शक्ति भी वही थे, अनुपम, अद्वितीय, बेजोड़... रामजी राय.

सही कह रहा हूं न।