Thursday, July 22, 2010

खाने को लेकर कुछ दिलचस्प किस्से


बचपन से लेकर आज तक खाने को लेकर मेरे मन में कभी पसंद-नापसंद का द्वंद्व नहीं रहा। इसका एक बड़ा कारण तो यह रहा कि छुटपन में ही मेरी राय बन चुकी थी कि खाने को लेकर पसंद-नापसंद बुर्जुआ मानसिकता की अभिव्यक्ति है। बाद में मैंने जब सर्वेश्वर की कविता पढ़ी तो अपना पक्ष और मजबूत पाया। लेकिन भात हमेशा ही मेरी कमजोरी रहा। बचपन में तो मैं भात के बगैर भोजन की कल्पना ही नहीं कर सकता था। कभी-कभी ऐसा अवसर आता तो मैं कुछ भी खाये बगैर सो जाता। ऐसा प्रायः रात में ही होता। जैसे ही मैं रात को दरवाजे पर से पढ़कर लौटता, मां से मेरा पहला सवाल होताखाना का बनैले हेंअर्थात् भोज में क्या बनायी हो। रो रात को मां से मेरा यही सवाल होता। जैसे ही उत्तर मिलता किरोटी बनी हैमैं झट मां को खटिया बिछाने कह देता।

इस बचपन की एक कहानी है। मेरे गांव में मधेसर सिंह नाम के एक सज्जन हैं। एक शाम को मैंने उनको गांव में पूआ बांटते देखा। पढ़ाई खत्म कर खाने को जब मैं घर आया तो वही पूर्वनिर्धारित रात्रिकालीन सवाल मां से किया। मनपसंद उत्तर मिलने पर मैंने आनन-फानन में खटिया बिछाने की आज्ञा जारी कर दी। भूख तो थी ही सो विमर्श में लग गया। अचानक ध्यान आया कि मधेसर सिंह वाला पूआ तो होगा ही। पूछने पर पता चला कि उसे तो पहले ही छोटे चचेरे भाइयों में से किसी एक ने चट कर रखा है। अंतिम सहारे का भी जब भरोसा रहा तो मैं सो गया। बस उस दिन से बड़े भाई अमरेन्द्र कुमार को मुझे चिढ़ाने हेतु उपयुक्त वाक्यांश हाथ लग गया-‘मधेसर वाला पूआ।मैं भात की अनुपस्थिति में जैसे ही खटिया बिछाने को कहता कि वे मां सेमधेसर का पूआदे डालने की सिफारिश कर जाते। इससे मेरा गुस्सा और भी बढ़ जाता।

दरअसल उन दिनों और आज भी मेरे गांव में दुर्गापूजा के अवसर पर चार-पांच दिनों तक पूरे गांव के लोगों एवं आसपास के गांव के ब्राह्मणों को पूआ-दूध खिलाने की परंपरा है। इस आयोजन से जुड़ी कई कहानियां हैं, एक मुझे अबतक याद है। बगल के किसी गांव के आधमनी जी (आध मन अर्थात् बीस किलो खाने के कारण उनका लोकप्रचलित नाम यही था) थे। उन्होंने जमकर खाया। कुछ इतना कि बेचारे का ठीक नाभि के पास पेट फट गया और दूध के फव्वारे निकल पड़े। घटना-स्थल पर ही मौत हो गई। मेरे यहां तो नहीं लेकिन दरभंगा-समस्तीपुर जिलों में खिला-खिलाकर मार डालने की कुलीन प्रथा रही है। वहां के लोग, जैसाकि बताते रहे हैं, भोजन के ऐसे खास आयोजनों पर पेट-भर खा लेने के बाद पैसे का लालच तक देते हैं। यानी एक लड्डू खाने पर पांच रुपये। कुछ देर तक यही क्रम चलता रहा, फिर एक लड्डू पर दस रुपये की छूट हो गई। इस तरह गरीबीजनित पैसे के लालच में कितने ही बेचारों की जान तक चली जाती रही है। कभी-कभी मेरे जेहन में आता है, इसका एक समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करूं।

बड़े भाई (अमरेन्द्र कुमार) ने मेरे भात-प्रेम को लेकर कई किस्से बना रखे थे जिसे वे जब-तब घर के लोगों को सुनाया करते। उनलोगों के लिए यह एक तरह से मनोरंजन का जरिया था। भात को लेकर यह आसक्ति तभी कमी जब मैं अपने सबसे बड़े भाई (अखिलेश कुमार) के साथ पटना में रहने लगा। उन्हें मेरी यह आदत पसंद नहीं थी, शायद इसलिए कि भोजन में भात की अधिकता गंवई संस्कार की द्योतक मानी जाती थी। अतएव उन्होंने मेरा प्रेम निष्कंटक नहीं रहने दिया।

मैं भोजन की मात्रा भी सामान्य से थोड़ा ज्यादा लेता था। छात्रावास-जीवन के दिनों में खाना बनकर जब तैयार होता तो बड़े भाई के लिए अलग थाली या प्लेट में निकाल मैं उसी बर्तन को लेकर बैठ जाता जिसमें भोजन बनता। इसके दो कारण थे-पहला तो यह कि थाली या प्लेट की कमी होती और दूसरे, बर्तन में उतना ही शेष होता जितना मैं आसानी से चट कर सकता था। मेरी इस हरकत पर भाई साहब कहते कि उनका बनाया खाना तो कभी ज्यादा होता है और कभी कम। हालांकि इसका श्रेय वे मुझे प्रदान करने में किसी तरह की कृपणता या अनुदारता का प्रदर्शन नहीं करते।

एम. . की परीक्षा के दौरान कुछ दिनों के लिए मैंने अपने मित्र अशोक कुमार के साथ रहना प्रारंभ किया था। वैसे भी लालबाग स्थित उनके डेरे पर जाता तो बगैर खाये शायद ही कभी लौटता। एक दिन की बात है कि मैं अशोक जी के यहां खाने पर बैठा था तभी मकान-मालिक डा. सुनील कुमार पी. एम. सी. एच. से अपनी ड्यूटी पूरी कर लौटे थे। वे रात्रिकालीन ब्रश कर रहे थे। टहलते-टहलते वे हमलोगों के दस्तरखान वाले कमरे में दाखिल हो लिए। उन्होंने मुझसे पूछा-‘क्या नेताजी कुछ और चलेगा क्या ?’ मैंने भी आखिर पूछ ही लिख, ‘कुछ है क्या ?’ इस पर वे बोले किमेरे यहां तो अभी तक कोई खाया नहीं है, इसलिए सब धरा पड़ा ही है।मैंने कहा-‘तो ले आइए।उन्होंने अपने नौकर सोहराई को आवाज दी। वह भात से भरी तसली ले आया। मैंने डा. साहब से आग्रह किया किआपलोग जितना खाएंगे उतना निकालकर अलग रख लें।डा. साहब ने कहा किहमलोग फिर बना लेंगे, इसलिए आप निःसंकोच पूरा भात भी ले सकते हैं।मैंने उनसे दो-तीन बार आग्रह किया लेकिन हर बार वे अपनी इसी बात को दुहराकर मुझे निरुत्तर कर देते। अन्त में मुझे ही निर्णय लेना पड़ा। मैंने कहा, ‘तो फिर तसली को थाली में उलट दीजिए। सोहराई ने भी ऐसा ही किया। कुछ ही मिनटों में मेरी थाली का भात गायब हो गया। अलबत्त डा. साहब को नये सिरे से भोजन बनने के इंतजार में ब्रश करने की प्रक्रिया को थोड़ा लंबा करना पड़ा। इस अप्रत्याशित सदमे से बाहर आने पर डा़ साहब ने कहा, ‘नेताजी, आप बुरा माने तो एक बात कहूं। आपको एक दिन भोजन पर आमंत्रित करनेवाला था, लेकिन अब हिम्मत नहीं होती।मैंने उनके दुख को कम करने की कोशिश करते कहा किनिराश हों, आपही का तो खा रहा हूं।सोचता हूं, अब वे मिलें तो कहूं कि पहले जितना नहीं खाता मैं।

उन दिनों मेरी मित्र-मंडली में कुछ नये नाम जुड़े जिनमें एक विनय कुमार थे। उनकी उदार मेहमान नवाजी की वजह से यदा-कदा वहां भी जूठन गिरा आता। वे छात्र-जीवन में थे। अल्पाहारी भी थे; इसलिए उनके लिए भोजन की मेरी मात्रा उनमें अतिरिक्त जिज्ञासा पैदा कर देती थी। खासतौर पर वे मेरे द्वारा मुर्गे की हड्डी तक छोड़े जाने के कारण आतंकित थे। बाद में उनकी शादी हुई और एक पत्नी तथा एक नौकरी के साथ कलकत्ते में रहने लगे। शादी के बाद उन्होंने अपनी पत्नी को मेरा परिचय भी शायद इसी रूप में दे रखा था। लेक्चरशिप के साक्षात्कार हेतु मुझे और अशोक जी को वहां जाना था। विनय जी को पहले से इस बात की सूचना दी जा चुकी थी। और विनय जी ने भीसंकटका सामना करने के लिए पत्नी को तैयार कर रखा था। अतएव व्यवस्था काफी हो चुकी थी। शायद उतनी जिसका मैं वाकई हकदार नहीं था। जैसा मैं कह चुका हूं, सामान्य से थोड़ा ज्यादा खाता था। दिक्कत यह भी थी कि विनय जी सामान्य से थोड़ा कम खाते थे। अतएव जिस हिसाब से उन्होंने तैयारी कर रखी थी, मुझे विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लेने पड़े। वैसे मैं खाने-पीने के मामले में विनम्रता ओढ़ने की जहमत मोल नहीं लेता।
मेरे बड़े भाई ने कभी एक कहानी सुनायी थी। वे किसी होटेल में खाना खा रहे थे। वहां बी.एन. कॉलेज के कोई प्रोफेसर थे वे भी खाना खा रहे थे। भोजनोपरांत जिस कटोरी में दाल मिली थी उसमें पानी डालकर वे उसे पी गये। इस कहानी के बाद मैंने भी अपना आचरण कुछ-कुछ वैसा ही बनाया। इससे एक कदम आगे बढ़कर मैंने छिलका आदि भी फेंकना गैर-मुनासिब समझने लगा। कहना होगा कि आम, मूंगफली, केला आदि मैं छिलका के साथ ही खाने लगा। मुझे लगा, इस तरह खाने से मात्रात्मक एवं आर्थिक-दोनों ही तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। विज्ञान की किताबों में रेसेदार भोजन के महत्व के बारे में भी पढ़ रखा था। कालक्रम से यह मेरी आदत हो गई। अब तो हालत यह हो गई है कि मैं किसी को छिलके उतारकर खाते या मुर्गे की हड्डी फेंकते देखता हूं तो मुश्किल से बर्दाश्त होती है। कुछ अच्छा नहीं लगता। गरीब देश में एक तरह की फिजूलखर्ची लगती है मुझे।

मेरी इन आदतों से लोगों को कभी-कभी परेशानी हो जाती है। तीन-चार साल पहले की बात है जब मैं मणि जी के यहां गया हुआ था। फलों का राजा आम का मौसम था, सो उन्होंने आम कटवाकर खाने को दिया। गूदा और छिलका में किसी तरह का भेदभाव किये बगैर मैं समूल खा गया। फिर हमलोग बातचीत में लग गये। अचानक मणि जी का ध्यान प्लेट की तरफ गया जो कहीं से भी जूठा होने का प्रमाण पेश नहीं कर रहा था। अंदर ही अंदर मणि जी चिंतित हो गये। मैंने उनकीदमित व्यथाउनके चेहरे पर पढ़ ली। हालांकि आश्वस्त होने खातिर उन्होंने पूछा भी। अतएव अविलब कहा, हां, हां, मैं आम खा चुका हूं। दरअसल मैं आम छिलके के साथ ही खाना पसंद करता हूं।इतना सुनने के बाद ही मणि जी का आत्मीय मन संतोष पा सका।

मेरे परिवार में मांसाहार का चलन कुछ पहले से ही रहा है। मेरे दादाजी (भुवनेश्वर सिंह) को खस्सी (बकरा) एवं मछली का पूरा चाव रहता। वे मानते थे कि खस्सी का मांस आंख की रोशनी बढ़ाने में मददगार होता है। वृद्धावस्था में, जब उनके मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, अक्सर कहा करते-‘एक खस्सी अगर खा लें तो बिजौरा (एक पड़ोसी गांव) तक का खपड़ा वे आसानी से गिनकर बता सकते हैं।हालांकि इस बात में वैज्ञानिक सच्चाई नहीं, मांसाहार की अतृप्त लालसा ही कुछ अधिक थी। मांस खाकर तृप्त होते उन्हें कभी नहीं पाया। मेरे सबसे छोटे चाचा (कृष्णंदन शर्मा जिनकी दिल की बीमारी से असामयिक मृत्यु हो गई) मांस बनाने एवं बांटने के एकमात्र इंचार्ज होते। मांसप्रेम में वे दादाजी पर भी बीस पड़ते थे। बनाते-बनाते उन्हें खाने की आदत थी। वितरण भी वे कुछ न्यायोचित तरीके से नहीं कर पाते थे। उनके नेतृत्व में दादाजी की तनिक आस्था नहीं थी। विश्वास तो हमलोगों का भी नहीं था, लेकिन विकल्पहीन। इसलिए किसी दिन घर में मांस बनता और खाकर हमलोग दालान पर सोने जाते तो एक अनौपचारिक मीटिंग का दृश्य बनता। दादाजी बड़ी बारीकी से एक-एक कर हम सब भाइयों से पूछते और पता करते कि कौन कितना खाया है। हमलोग तृप्त होने का अहसास कराना चाहते तो वे सहज ही अविश्वास की हंसी हंसते और बोलते, ‘हमारी थाली में तो जब गिराया तो मांस टन्न-से बोलाऔर फिर सभा भंग हो जाती।
मुर्गे का मांस खाकर वे अपने हिंदुत्व की रक्षा नहीं कर सकते थे। मुर्गे का मांस खाना मुसलमान होना था जो उन्हें तनिक पसंद था। उनके कथनों से मुसलमानों के प्रति घृणा झलकती। वे अक्सर कहते, ‘हिंदू बढ़े नेम से, मुसलमान बढ़े कुनेम से।इस कुनेम में मुर्गा खाना विशेष रूप से शामिल था। मछली के बारे में वे एक लोक प्रचलित कहावत पढ़ते-‘जे नर मछली खात है मुड़ी-पूंछ समेत। ते नर बैकुंठ जात है नाती-पोत समेत।।इसका वे जीवनपर्यंत अक्षरशः पालन करते रहे। वे मछली खाते-खाते मरे। उनकी आत्मा अब भी भटक रही होगी क्योंकि कुछ हिस्सा उनकी हथेली पर धरा रह गया था।
मांसाहार संबंधी कई वर्जनाएं मेरे बड़े भाई अखिलेश कुमार ने तोड़ी। गोमांस अथवा सूअर के मांस से उन्हें कोई परहेज नहीं रह गया था। उनकी शागिर्दी में मेरे लिए भी ये बातें विशेष महत्व या खास तवज्जो की नहीं होतीं। मसलन मैंने भी गोमांस के व्यंजन चाव से खाये। सन् 85 के आसपास हम दोनों भाई दरियापुर स्थित पटना ट्रेनिंग कॉलेज के हॉस्टल में चुके थे। वहां अब्दुल खालिक बदर नाम के एक आत्मीय सज्जन थे जो सब्जीबाग के दिलनवाज होटेल से हमलोगों के वास्ते टिकिया वगैरह ले आते। बड़े भाई तो उनके साथ बकरीद की दावत तक उड़ा आते। बदर साहब के मेजबान साथ में एक हिन्दू को पाकर जब कभी परेशान होते तो बदर साहब बेसाख्ता बोलते, अरे मियां, डरने की कोई बात नहीं। ये भी दस्तरखानी हैं और बड़े-छोटे का फर्क नहीं करते। टिकिया-कबाब तो हमलोगजकियाकी तरह लगभग रोजाना ही खाते, अलबत्त यीस्टू कभी-कभार। और उसे हमलोग बदर साहब की सिफारिश से इस्लामिया होटेल से खरीदते। जाड़े में कभी-कभार नेहारी का आनंद लूटते।

एम. . की मित्र-मंडली में शाह अहसानुद्दीन भी था। अशोक जी के लालबाग स्थित डेरे पर जाता तो उससे भी मिलना होता। उसके कमरे में साजिद नाम के दो लड़के और रहते। एक लंबे कद का तो दूसरा नाटे कद का। दूसरे को मैं छोटा साजिद कहता। वह मेरे गोमांस-प्रेम को हवा देता। मसलन शाम में नाश्ते के लिए जाता और ऐन मौके पर मैं मिल जाता तो साथ चलने का आग्रह करता। खिलाने में रुचि और उदारता दिखाता। तभी अहसान ने खलल पैदा कर दी। एक दिन उसने छोटे साजिद से आखिर कह ही दिया, ‘मियां, किस आदमी के चक्कर में तुम पड़े हो। ये गाय-बैल ही नहीं, सूअर से भी आगे जा चुके हैं।इतना सुनने के बाद उसके उत्साह की हवा निकल गई। इसके बाद उसने अपने को घोंधे की तरह अंदर को समेट लिया। और इस तरह मेराभोजनालयबंद हो गया।

कुछ साल पहले की बात है। बड़े भाई पटेल नगर का आवास छोड़कर मेरे पड़ोस में बसे थे। एक दिन जमकर बारिश हुई और कैंपस में पीले मेढ़क उछल-कूद मचाने लगे।मछुआरेके हाथ से मछली बच निकले-ऐसा कैसे संभव था। अविलंब अमरेन्द्र भैया कोशिकारजिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश मिल गया। वे फौरन पानी में कूद पड़े। फिर क्या था। सारे मेढ़क पानी की बजाय किचेन में दिखने लगे-‘उभयचरहोने को चरितार्थ करते हुए। शिकार को मुट्ठी में कर बड़े भाई ने मुझे फोन से सूचित किया। वहां पहुंचा तो पाया कि घोर मांसाहारी परिवार में भी खाने की केवल दो ही थाली सजायी जा रही है। मैंने चावपूर्वक खाया। भाई साहब ने पूछाशिकार कैसा बना ?’ ‘देहाती मुर्गे और कबूतर के बीच की चीज है’, मैंने कहा। सचमुच बहुत ही स्वादिष्ट था। आज भी उसकी याद आती है तो स्वाद मुंह में घुलने लगता है। लेकिन शहरों के बारे में वे क्या जाने जिन्होंने लाहौर ही नहीं देखा।

2 comments:

मुसाफिर बैठा said...

'खाने को लेकर कुछ दिलचस्प किस्से'में वर्णित ये सच्ची घटनाएँ एकदम अछूती सी हैं,इतने अनोखे कि कोई इसे किस्से ही मन ले.आपके भोजन-पसंद पर पहली बार और वह भी इतनी तफसील से पढ़ने को मिला है.कहना का अंदाज़ सोने में सुगंध डाल रहा है सो अलग.अलबेले अनुभव हम सब के पास होते हैं पर उसे औरों को बाँटने के लिए कारीगर शब्द कुछ ही लोग देने में सक्षम होते हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

खाया तो हमने भी सब है…खाते भी हैं…लेकिन थोड़ा-थोड़ा :)