Monday, May 16, 2011

कबीर को पढ़ते हुए--अर्थात कबीर का स्त्री पाठ


भक्तिकाल के सर्वाधिक 'क्रांतिकारी' समझे जानेवाले कवि कबीरदास ने ज्यादा काम नारी–जाति को गलियाने का ही किया. सतवंती या पतिव्रता की उन्होंने जरूर प्रशंसा की, किन्तु ‘नारी नदी अथाह जल, बूड़ि मुआ संसार’, ‘नागिन के तो दोय फन, नारी के फन बीस’, ‘नारी की झाईं परत अंधा होत भुजंग’, ‘नारी बड़ा विकार’ आदि कहकर उन्होंने नारी–जाति की घनघोर निंदा की है और ‘चली कुलबोरनी गंगा नहाय’-जैसी व्यंगोक्ति से उसका उपहास किया है. (श्री भगवान सिंह, पद्मावत : नारी-श्रेष्ठता का प्रथम काव्य, कसौटी, अंक-८, पृष्ठ १२९). इस तरह औरतों के प्रति कबीरदास ने कितना विषवमन किया है–ध्यान, समाधि, उपासना आदि के लिए स्त्री को व्यवधान बताकर उन्होंने उसकी आध्यात्मिक और बौद्धिक शक्ति की घनघोर अवमानना की है (वही, पृष्ठ १३७). ‘ज्ञातव्य है कि कबीर ने विस्तार से स्त्री-विरोधी विचार ही नहीं प्रकट किये हैं, भले भक्त होने के कारण, सती-प्रथा को भी गौरवान्वित किया है, भले प्रतीक रूप में उसका इस्तेमाल करते हुए’ (नंदकिशोर नवल, कबीर की वाणी : एक निजी पाठ, कसौटी-४, पृष्ठ ६).

कबीर के यहाँ गुस्सा एक स्थायी भाव की तरह है. कबीर का यह गुस्सा गंगा–स्नान को जाती स्त्रियों के प्रति देखने लायक है-

‘चली कुलबोरनी गंगा न्हाय।

सतुवा कराइन बहुरी भुंजाइन, घूंघट ओटे भसकत जाय।

गठरी बांधिन मोटरी बांधिन, खसम के मूंडे दिहिन धराय।

विछुवा पहिरिन औंठा पहिरिन, लात खसम के मारिन धाय।

गंगा न्हाइन जमुना न्हाइन, नौ मन मैल लिहिन चढ़ाय।

पांच पच्चीस के धक्का खाइन, घरहूं की पूंजी आइ गंवाय।’

कबीर साहब यह नहीं देख सके कि कम से कम गंगा-स्नान आदि के बहाने औरतों को घर की चहारदीवारी से बाहर निकलने का मौका मिलता था. इसे समझा जायसी ने. तभी उनकी पद्मावती और उसकी सखियाँ मानसरोबर–स्नान को अपने लिए स्वतंत्र क्रीडाओं का एक अवसर मानती हैं. मानसरोवर स्नान के बहाने ही तो पद्मवती को सात खंड के धवल गृह या अन्तःपुर के एकांत से बाहर निकलने का अवसर मिलता है. वस्तुतः जायसी ने यहाँ लोकजीवन का बड़ा ही सच्चा चित्र प्रस्तुत किया है. गांवों में जवान लड़कियां पर्व–त्यौहार के अवसर पर झुण्ड में आस-पास के तालाब या नदी आदि में स्नान करने जाती हैं–गाती हुई, चहलकदमी करती हुई और उन्मुक्तता की सांसें लेती हुई. ऐसे अवसरों का महत्त्व उनके लिए स्वतंत्रता दिवस जैसा ही होता है. जायसी ने ऐसे स्नानों के महत्त्व को पहचाना, किन्तु ‘बुद्धिवादी’ कबीर को यहाँ भी पाखंड या कर्मकांड ही नजर आया. (देखें, श्री भगवान सिंह, पूर्वोधृत , पृष्ठ १२९-३०).

स्त्री जाति के प्रति कबीर के इस गुस्से को उनकी भक्ति की अवधारणा में ढूंढा जा सकता है. उनकी भक्ति की जो अवधारणा है, वह मध्यकालीन पितृसत्तात्मक मूल्यों से प्रभावित लगती है. संभवतः इसीलिए प्रकृति ‘स्त्री’ मानी जाती है और परमात्मा ‘पुरुष’. कबीर के अनुसार स्त्री प्रकृति में आसक्त जीवात्मा स्त्रीलिंग तथा पुरुष परमात्मा में तल्लीन जीवात्मा पुल्लिंग से संबोधित होने के योग्य है, यथा–

‘समधी के संग नाहीं आई, सहज भई घरबारी.

कहैं कबीर सुनो हो संतो, पुर्ख जनम भौ नारी’ ..

जबतक सुरत प्रकृति में स्थित थी या प्रकृति–मंडल में रहकर उसके द्वारा भक्ति की जा रही थी या जबतक वह पूर्णरूपेण प्रकृति मंडल का त्याग नहीं कर सकी थी, तबतक उसके लिए स्त्रीलिंग का प्रयोग हुआ और जब ‘लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल’ की स्थिति हुई, प्रभु में समाकर प्रभु से एकाकार हो गई, तब वह पुरुषत्व प्राप्त कर ली और उसके लिए ‘ताते रहेउ अकेला’ पुल्लिंग शब्द का प्रयोग हुआ. माया में आबद्ध स्त्री है–चाहे वह स्त्री शरीर में हो या पुरुष शरीर में. जब पुरुष परमात्मा को प्राप्त कर लिया जाता है, तब वह पुरुष कहे जाने योग्य है, चाहे वह स्त्री शरीर में ही क्यों न हो। ( देखें, साध्वी ज्ञानानंद जी, अध्यात्म का आश्चर्य, श्री कबीर ज्ञान प्रकाशन केन्द्र, गिरिडीह, प्रथम संस्करण, २०००, पृष्ठ १७-१८).

स्त्री भक्ति-मार्ग में एक स्थायी बाधा (महाविकार) भी है. स्वयं कबीर की आत्मस्वीकारोक्ति देखें-

‘नारी तो हमहुं करी, तब ना किया विचार,

जब जानी तब परिहरी, नारी महाविकर’. (देखें, रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय , लोकभारती प्रकाशन, नवीन संस्करण २००६, पृष्ठ ४९४).

कबीर की अनेक ऐसी कविताएँ हैं जिनको लोक–परलोक, वैवाहिक प्रेम और विवाह सम्बन्धी कुरीतियों (यथा बाल-विवाह, बेमेल विवाह आदि) से सम्बंधित करके व्याख्यायित किया जाता रहा है, जबकि असलियत में उन पदों में कुछ और ही बात है. हमारा पितृपक्ष हमें लगातार भरमाकर इस तथ्य से दूर ले जाता रहा है. प्रसिद्ध पद ‘दुलहिनि मोरी गावहु मंगलाचर’ को ‘मंगलाचार’ शब्द पर जोर देकर सीधे–सीधे विवाह-उत्सव का गीत व्याख्यायित किया गया, लेकिन विवाह में ‘सरोवर के किनारे वेदी’ बनाने का विधान तो है नहीं. और यह भी कि राजस्थान में सती के गीतों को ‘मंगलाचार’ कहते हैं.

‘सरोवर’ पर जोर देते ही अर्थ-विधान ‘दुल्हन’ को ‘सती’ के लिए लाई गई स्त्री में बदल देता है. तत्कालीन दौर के घुमक्कड़ इब्नबतूता ने अपने यात्रा- वृत्तांत में लिखा है, ‘तीन कोस चलने के बाद हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहां जल की बहुतायत थी और वृक्षों की सघनता के कारण अंधकार छाया हुआ था. वहां चार गुम्बद (मंदिर) बने हुए थे और चारों में एक देवता की मूर्ति प्रतिष्ठित थी. इन चारों के मध्य एक एक ऐसा सरोवर था जहां वृक्षों की सघन छाया होने के कारण धूप नाम को भी न थी. इस कुंड के पास नीचे स्थल में अग्नि दहकाई गई. पन्द्रह पुरुषों के हाथों में लकड़ियों के गट्ठे बांधे हुए थे और दस पुरुष अपने हाथ में बड़े –बड़े कुंदे लिए खड़े थे. नगाड़े, नौबत और शहनाई बजानेवाले स्त्रियों की प्रतीक्षा में खड़े थे ...इतना कहकर वह प्रणाम कर तुरंत उसमें कूद पड़ी. बस नगाड़े, ढोल, शहनाई और नौबत बजने लगी. उपस्थित जनता भी चिल्लाने लगी (देखें, इब्नबतूता की भारतयात्रा , सती वृत्तांत, पृष्ठ २४-२५).

सती होने की घटनाओं का मध्यकाल में आँखों देखा हाल जानना है तो कबीर की कविता सुनाती है:

‘सती जलन कूं नीकसी, पिउ का सुमिर सनेह.

सबद सुनत जिउ नीकल्या भूली गई सब देह.’

घर से सती होने को निकली वह पति के प्रेम की तथाकथित प्रतिज्ञा में भूली हुई थी. ढोल नगाडों की आवाज और सती के जयघोषों की भयावह आवाज से ही दम निकल रहा है. अब देह की सुध भला कैसे आ सकती है. जिउ निकालना कोई साधारण क्रिया नहीं है. पीड़ा का गंभीर संकेन्द्रण यहाँ है. पूरे काव्य व्यापार का बलाघात इसी एक बिंदु पर है. (अनुराधा, सती प्रथा, भक्ति काव्य और हिंदी मानसिकता , हंस, फरवरी २००८, पृष्ठ४०)। कबीर की कविता पर सती प्रकरण को लेकर बात करना इसलिए भी जरूरी है कि अबतक का सोच विचार का पितृपक्षीय दायरा मध्ययुगीन साहित्य में अधिक से अधिक श्रृंगार और मात्र कुछ धार्मिक आडम्बरों के विरोध भर को ही देख पता है. ‘धर्म के वाह्याडम्बर और शास्त्रीय जकडबंदी के प्रति संवेदनशील मन का विद्रोह ही भक्ति है.’ (देखें, मुजीब रिज्बी, मध्यकालीन धर्मसाधना , इन्द्रप्रस्थ भारती, कबीर विशेषांक, पेज१०). उनके लिए भक्ति की शक्ति प्रेम की बराबरी और सघनता तक सिमटी है. वे यह नहीं देख पाते कि आधी आबादी कहाँ गई. कबीर की कविता सती प्रसंगों को सामने लाकर यह दिखाती है कि देखो, आधी आबादी जल रही है या जलाई जा रही है:

‘विरह जलाई हौं जलूं, जलती जलहर जाऊं

मो देख्या जलहर जले, संतो कहां बुझाऊं...’ (अनुराधा, पृष्ठ ४१)

लेकिन कबीर की कविता को सती विरोध की कविता नहीं माना जा सकता. वे भी अन्य कवियों की तरह अनेक बार सती का महिमामंडन पूरे मनोयोग से करते हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि सती की व्यथा का कोई अनुभव करता-कराता है तो भक्तिकाल में वे अकेले कवि हैं. यदि इन कविताओं का कालक्रम निर्धारित होता तो सती के प्रति उनके विचार के विकास को रेखांकित किया जा सकता था. बहुत संभव है कि किसी काल में उनके लिए सती एक आदर्श रही हो और किसी अन्य समय में सती- घटनाओं को आँखों से देखने के बाद वे अपने इस आदर्श पर कायम न रह पाए हों. (अनुराधा, पृष्ठ ४१)

मालवा में पान के बीड़े से शुरू होता है सती का मृत्यु-उत्सव. मालवा का एक लोकगीत है, ‘बावड लो नी बीड़ो पान को’. पान का बीड़ा लेने के बाद ‘स्त्री’ के लिए सती का प्रश्न प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है. विवाह के साथ घूँघट धारण करनेवाली स्त्री का घूँघट सती का बीड़ा लेते ही हट जाता है (सिर उघड़ जाता है). कबीर जब कहते हैं, ‘तोको पीव मिलेंगे घूँघट के पट खोल रे...कहैं कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे’ तो सती प्रकरण उनके ध्यान में है. एक पद है ‘मैं अपने साहब संग चली, हाथ में नरियल मुख में बीड़ा, मोतियन मांग भरी. लिल्ली घोड़ी जरद बछेड़ी, तापै चढ़ि के भली’. यह सती होने के लिए ले जाई जाती स्त्री का चित्र है. (अनुराधा, ४२ ).

Tuesday, April 12, 2011

जनगणना की शुरुआत, नौकरी की बरसात


वर्ष २०११ की जनगणना के आरंभिक आंकड़ों से मिले-जुले निष्कर्ष निकले जा रहे हैं. साक्षरता में वृद्धि,जनसँख्या की वृद्धि दर में कमी आदि के बहाने कहा जा रहा है कि २१ वीं सदी का भारत अपने भविष्य के बारे में सचेत हो रहा है. लेकिन जिस जनगणना रिपोर्ट के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं उसे ही अगर कागजी आंकड़ेबाजी का पुलिंदा कहें तो गलत न होगा। जनगणना प्रभारी और चार्ज अधिकारियों की रिपोर्ट में कार्य पूरा हो चुका है, जबकि असंख्य नागरिक ऐसे हैं, जो जनगणना से अब भी वंचित हैं। जिन तथ्यों पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर रचनात्मक कार्य होने हैं, वोटरकार्ड की तरह सरकारी अमलों ने उन्हीं आंकड़ों को ड्रामा बना दिया है। जनगणना के दूसरे चरण में गंभीरता और सक्रियता बरतने की हिदायतों के बावजूद अफसरानों ने बेहद हल्कापन दिखाया।

जाहिर है कि हर दस वर्ष पूरे होने पर देश में भारत सरकार द्वारा जनगणना कराई जाती है ताकि देश के विभिन्न राज्यों में रहनेवाले नागरिकों की संख्या के आंकड़े मिले सके। इसके आधार पर भविष्य में आवासीय, खाद्यान्य और मूलभूत सुविधाओं की विकास योजनाओं का खाका तैयार किया जाता है, जिसमें जनगणना की संख्या के आधार पर गरीब योजनाओं में गरीबों को लाभ मिलने की बात होती है. लेकिन जनगणना कर्मियों द्वारा जिस प्रकार से जनगणना को कागजों में निपटाया गया है, ऐसे में भविष्य की योजनाओं में देशवासियों को योजनाओं का वो लाभ नहीं मिल सकेगा, जिसके वे हकदार हैं।

कहना न होगा कि गणना उन्हीं लोगों की करनी थी जो ९ से २८ फरवरी के बीच जनगणना स्थल पर पाये गये हों. लेकिन ऐसा शायद ही हो सका. उन तमाम लोगों की गणना कर ली गई जो उक्त अवधि के बीच वहां नहीं रहे. इसके साथ ही एक-एक आदमी की गणना टिन या उससे अधिक जगहों पर हुई. जैसे अगर कोई व्यक्ति या परिवार जो भागलपुर के किसी गांव का निवासी है और कुछ दिनों/सालों तक पटना में रहने के बाद दिल्ली आदि महानगरों में रहने लगा तो उसकी गिनती इन तीनों ही जगहों पर हुई. गांव में भी उसकी गणना हुई फिर पटना और दिल्ली में भी. ऐसे लोगों की आबादी बहुत अधिक है जो एक से अधिक जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे.

दूसरे, जनगणना के दूसरे चरण के अंतिम दिन अर्थात 28 फरवरी 2011 को सभी बेघरों को भी गणना होनी थी. देश के तमाम प्रगणकों को 28 फरवरी की अर्धरात्रि में अपने गणना ब्लाक में घूम घूमकर बेघर लोगों की गणना करनी थी। इसके अंतर्गत भिखारियों, घुम्मकड़ों, फेरीवालों, सामान बेचने वाले तथा सड़कों के किनारे, रेल पटरियों व प्लेट फार्मो, बस अड्डों, पार्को, पुलों व पूजा स्थलों के बाहर खूलें में सोने वाले व्यक्तियों की गणना की जानी थी. रात्रि को बेघर परिवारों की गणना के लिए विशेष प्रबंध भी किये जाने थे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका. जनगणना कर्मियों की लापरवाही से इनमें से अधिकांश की गणना नहीं हो सकी। अधिकतर जनगणना कर्मचारी रात्रि में घूमकर बेघरों की गणना करने की बजाय घरों पर सोते रहे।

अव्वल तो यह कि २८ फरवरी की अर्धरात्रि की बेघर परिवार के लोगों की गणना शहरी क्षेत्र के लिए नहीं तो कम से कम ग्रामीण क्षेत्र के लिए एकदम ही अव्यावहारिक थी. हिंदुस्तान और खासकर बिहार के कई गांव आज भी ऐसे हैं जो दिन में दुर्गम्य हैं. उन गावों में रात में पहुंचकर लोगों की गणना करना कल्पना मात्र है. प्रगणक अगर उसी गांव के होते तो इस बारे में कुछ आशा भी बंधती लेकिन ऐसा नहीं था. प्रगणक दूसरे गांव के और गणना दूसरे गांव की करनी थी उसमें भी अर्धरात्रि को. बिहार जैसे अनेक प्रान्तों में जहां के अधिकतर क्षेत्र अति संवेदनशील हों और प्रशासन तक जाने में भय खाता हो, प्रगणक से यह उम्मीद करना कि मध्यरात्रि को पहुंचकर वे गणना करेंगे, भारी भूल थी या फिर ऐसे नतीजों को वे पहले ही से नियति मानकर इत्मीनान थे. शायद इसीलिए अर्धरात्रि की गणना के लिए कोई प्रबंध नहीं किया जा सका था. नतीजतन बेघर परिवारों की गणना नहीं हो सकी. अगर कही-कहीं ये आंकड़े आए भी तो नकली. इसे घर में बैठे-बिठाये ही भर लिया गया.

५ मार्च तक पुनरीक्षण का कार्य करना था. इस बीच प्रगणक को अपने गणना ब्लौक जाकर जन्म और मृत्यु की अद्यतन जानकारी हासिल करनी थी तथा नवजात शिशु का नाम दर्ज करना था और मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति का नाम सूची से काटना था. इस तरह प्रगणक एवं पर्यवेक्षक को जनगणना की अंतिम रिपोर्ट ५ मार्च के बाद प्रस्तुत करनी थी लेकिन अपने को तनाव-मुक्त रखने के लिए चार्ज अधिकारियों ने २८ के तुरंत बाद ही जमा करा लिया. इस तरह ५ मार्च तक जो पुनरीक्षण का कार्य होना था वह नहीं हो सका. तात्पर्य यह कि अंतिम रिपोर्ट जो ५ मार्च तक की जानकारी के आधार पर तैयार करनी थी उसे २८ को ही भर लिया गया. ऐसे में जनगणना रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय हो सकी है, सहज ही सोचा जा सकता है.

सूचनादाता से २९ सवालों की जानकारी हासिल करनी थी लेकिन कई जगहों पर ऐसा भी हुआ कि प्रगणक अपने गणना ब्लौक न जाकर घर में ही बैठे-बिठाये सारे खाने भर डाले. उम्र आदि में अंतर का भी ध्यान नहीं रखा गया. नतीजतन एक गांव के सारे लोग या तो २२ साल के दिखाए गये या ३२ साल के. इसका नतीजा यह हुआ कि वृद्ध या बच्चों के सही आंकड़े नहीं आ सके.

इसका एक हास्यास्पद पहलू यह भी रहा कि जिन कर्मियों को जनगणना कार्य के लिए नियोजित किया गया था उनमें से बहुत कम ही लोग ऐसे थे जो कार्य की महत्ता एवं गंभीरता को समझते हुए अंजाम दे सके. अधिकतर लोगों ने अपना काम दूसरे लोगों से कराया. लोग बाग के बीच यह मजाक काफी लोकप्रिय रहा कि ‘जनगणना की शुरुआत क्या हुई, नौकरी की बरसात हुई,’ बिहार में आंगनवाडी सेविकाओं/महिलाओं को इस ‘महत्वपूर्ण’ कार्य में व्यापक तौर से लगाया गया. अधिकतर सेविकाएं जो अपना हस्ताक्षर तक करना नहीं जानती, ने जनगणना फॉर्म कैसे भरा होगा आसानी से समझा जा सकता है. कुछ के पति-बेटे तो कुछ के ‘सहयोगी’ की भूमिका महत्वपूर्ण रही. कई सेविकाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने अपना हस्ताक्षर तक नहीं किया. यह काम भी उसके पति-बेटे या सहयोगी करते रहे.

इसलिए ये आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं. इनके आधार पर कोई नीति निर्धारित करना हमारी ऐतिहासिक भूल हो सकती है. वैसे हमारी सरकार के पास ऐसी भूलों का भी एक इतिहास है.

Sunday, February 6, 2011

नया पाठ्यक्रम , पुरानी मानसिकता



कहना न होगा कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा (२००५) इस बात की प्रस्थापना करती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए. यह प्रस्थापना किताबी ज्ञान की उस पारंपरिक विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी शिक्षा-व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच ‘मर्यादा’ का अंतराल में विश्वास करती रही है. इस नई पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुसतकें उपरोक्त बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास हैं. इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है. ऐसे प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति (१९८६) में वर्णित बाल-केंद्रित शिक्षा-व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में ऐतिहासिक महत्त्व के साबित होंगे.

पुराने पाठ्यक्रम के बच्चे इतिहास विषय के प्रति अरुचि प्रदर्शित करते कहा करते थे-‘इतिहास-भूगोल है बेवफा, सुबह पढ़ो शाम को सफा’. तब इतिहास पढ़ने-पढ़ाने का मतलब तिथि और घटनाओं का रट्टा मारना होता. थोड़ी भी चूक होने पर शिक्षक या अभिभावक की कोफ़्त का शिकार होना पड़ता और मार खानी होती. अब इतिहास की धारणा बदली है. हालाँकि नेहरु काफी पहले ही अपनी दस-वर्षीया बेटी इंदु (तब इंदिरा नहीं बनी थी) को लिखे पत्रों में स्पष्ट कर चुके थे कि इतिहास का मतलब चंद तारीखों से नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लानेवाली ताकतों से है. साथ यह भी कि इन्हीं ताकतों की वजह से ‘विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में’ एक सामान्य आदमी भी नायक हो जाता है. वर्ग ८ के इतिहास के पाठ्यक्रम के माध्यम से बच्चों में इन्हीं विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की समझ पैदा करने की कोशिश है. बच्चों में किसी भी घटना के बारे में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे महत्वपूर्ण सवाल करने की समझ और जिज्ञासा पैदा करने का यत्न है. ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे सवाल पहली नजर में अति सामान्य प्रतीत हो सकते हैं लेकिन गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह दरअसल इतिहास का ‘कार्य-कारणवाद’ है. मजे की बात है कि यह सब वर्ग ८ के बच्चों को बगैर किसी दार्शनिक सूत्र का सहारा लिए कथा एवं संवाद शैली के माध्यम से खेल-खेल में बताया जा रहा है.

इतिहास एक वैश्विक परिघटना है. भारत के अतीत की कहानी दुनिया के लंबे इतिहास से जुड़ी हुई है. इस बात को समझे बगैर भारत के इतिहास (अतीत) में आये परिवर्तनों को समझना आसान नहीं रह जाता. यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब आज वैश्वीकरण के इस दौर में तमाम अर्थव्यवस्थाएं और समाज दिनोंदिन गहरे तौर पर एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं. इतिहास को हमेशा भौगोलिक सीमाओं में बंद करके नहीं देखा जा सकता. उदहारण के तौर पर, हम भारत में मुग़ल साम्राज्य के पतन को ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन (विशेषकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) और दोनों ताकतों के बीच के अंतर्विरोध को जाने बगैर नहीं समझ सकते. ठीक इसी तरह फ़्रांस की राज्यक्रांति को अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष के बगैर नहीं समझा जा सकता. और इन तमाम यूरोपीय घटनाक्रमों को को जाने-समझे बगैर भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास को जानने-समझने का दावा कितना भ्रामक और निराधार हो सकता है-आसानी से समझा जा सकता है. इसलिए फ्रांसीसी इतिहासकार फर्नांड ब्रौदेल के शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि ‘विश्व के बिना राष्ट्र की बात नहीं हो सकती’. अलग से कहने की जरूरत शायद शेष नहीं कि कक्षा ९ और १० की इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों का मुख्य जोर यही समझाने पर है.

ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि आज से पहले के पाठ्यक्रमों में विश्व इतिहास का अध्ययन अनुपस्थित/उपेक्षित रहा है. बल्कि यह कहना शायद ज्यादा उचित होगा कि नये पाठ्यक्रम में विश्व इतिहास की ‘प्रस्तुति’ एक बदले हुए अंदाज में हुई है. अब तक आधुनिक विश्व का इतिहास अक्सर पश्चिमी दुनिया के इतिहास पर ‘आश्रित’ रहा है. मानो सारे परिवर्तन और सारी तरक्की सिर्फ़ पश्चिम के देशों में ही होती रही हो, बाकी देशों के इतिहास एक समय के बाद ठहरकर रह गये हों. गतिहीन और जड़ हो गये हों. इस इतिहास में पश्चिम के लोग उद्यमशील, रचनात्मक, वैज्ञानिक मेधायुक्त, मेहनती, कुशल और बदलाव के लिए तत्पर दिखाई पड़ते हैं. दूसरी तरफ पूर्वी समाज-या अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका के लोगों को परम्परानिष्ठ, आलसी, अंधविश्वासी, और बदलावों से कन्नी काटनेवाला दिखाया जाता है. उपरोक्त प्रथम कोटि का इतिहास उपनिवेशवाद के दौर में प्रस्तुत किया गया था, अपने निहित स्वार्थ के तहत. भारत समेत एशियाई देशों की ऐसी अपरिवर्तनीय छवि प्रस्तुत किये बगैर यूरोप अपनी ‘नस्ली श्रेष्ठता’ घोषित नहीं कर सकता था. इसी श्रेष्ठता-बोध से यूरोप की गोरी जातियों को एशियाई देशों के लोगों को सभ्य बनाने का ‘नैतिक भार’ मिला था. नये पाठ्यक्रम ने जो विश्व इतिहास की प्रस्तुति की है उससे यूरोप की श्रेष्ठता का मिथ्या आवरण हट चुका है. अब बच्चे समझ सकते हैं कि भारत का इतिहास मात्र राजे-रजवाड़े, नटों-सपेरों का ही नहीं रहा है, बल्कि वैज्ञानिक प्रगति का भी उसमें अहम हिस्सा है.

हालाँकि कहा जा सकता है कि पाठ्यक्रम के निर्माण में कुछ अति उत्साह का भी प्रदर्शन हो गया है जिसे वर्तमान शैक्षणिक परिवेश में व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता. विहित हो कि वर्ग ९-१० के छात्रों के पाठ्यक्रम में साहित्य, क्रिकेट, पोशाक आदि विषयों का इतिहास भी शामिल किया गया है. पाठ्यक्रम निर्माता शायद इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इसे लागू करनेवाले शिक्षक स्वयं पठन-पाठन’ के ‘मल्टी डिसिप्लिनरी एप्रोच’ के कितने कायल हैं. कहना न होगा कि इन शिक्षकों की शिक्षा-दीक्षा की जो परिपाटी रही है, उसमें हर विषय का अपना एक जबरदस्त घेरा है. सभी विषय अपनी-अपनी दीवारों से घिरे हैं. कुछ दिनों पहले तक या कहें कि पुराने पाठ्यक्रम के लिहाज से इतिहास विषय को पढ़ाते हुए अपेक्षा होती थी कि शिक्षक अथवा छात्र साहित्य आदि की चर्चा न करे. ऐसा करना विषय की मर्यादा का उल्लंघन अथवा कहें कि साफ विषयान्तर माना जाता था. कहना जरूरी नहीं कि यह शिक्षक एवं छात्र दोनों ही की विषयगत कमजोरी समझी जाती थी.

अब जबकि नये पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाना है, उस शिक्षक से जो ‘विषय की शुचिता’ का कायल और पैरोकार रहा है, उम्मीद की जाती है कि वे क्रिकेट से लेकर फिल्म तक को अपने अध्ययन का विषय बनायें. ये वही शिक्षक हैं जो ‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब’ जैसी ‘सूक्तियों’ का ‘मन्त्र-जाप’ करते रहे हैं. क्रिकेट और फिल्म की बात करने मात्र से छात्रों को ‘भ्रष्ट’ का खि़ताब देनेवाले शिक्षक इन चीजों की पढ़ाई करवाना किसी बड़े ‘अनर्थ’ से कम है क्या? तात्पर्य यह कि सरकार को पहले शिक्षण-प्रशिक्षण के जरिये शिक्षकों में नये पाठ्यक्रम के अनुकूल मानसिकता पैदा करने की चेष्टा करनी चाहिए थी. लेकिन दुर्भाग्यवश भारत की शिक्षा-व्यवस्था औपनिवेशिक काल से ही ‘अभिनव प्रयोग’ की शाला रही है. इतिहास के पाठ्यक्रम में पोशाक (ड्रेस) के इतिहास को शामिल करनेवाले इतिहासकारों ने यह सोचने की जहमत ही नहीं उठायी कि अपने मुल्क में इसपर अद्यतन शोध की क्या स्थिति है. जिस तरह संविधान निर्माताओं ने विश्व के तमाम दूसरे सविधनों की अच्छी बातों का ‘अजायबघर’ रच डाला. यह ध्यान ही न रहा कि भारतीय जनमानस उसके लिए सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से तैयार है भी या नहीं. यह नया पाठ्यक्रम भी कुछ मामलों में उसी की स्मृति ताजा कराता है.

Tuesday, January 11, 2011

विवेकानन्द और भारतीय नवजागरण

स्वामी विवेकानन्द उन्नीसवीं शती के महान विभूतियों में से एक थे। इनका नाम इनके गुणों के कारण इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर रहेगा। सच्चे अर्थों में स्वामी जी संपूर्ण एवं अखंड राष्ट्रीयता के समर्थक थे। वे राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति थे। सत्य तो यह है कि उनका उदय आध्यात्मिक भूख के साथ हुआ, लेकिन इन्होंने जल्द ही अपने आपको राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ लिया। प्रायः ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो मुख्यधारा से जुड़ पाते हैं। स्वामी जी ने अपनी मर्यादा का पालन बखूबी किया।

स्वामी विवेकानन्द हिन्दू धर्म के समर्थक थे। हिन्दू धर्म अपनी रूढ़ियों के कारण पतन की ओर अग्रसर था। इस धर्म के क्रमशः ह्रास का कारण कट्टर वेदवाद का प्रचार था। उन्नीसवीं शती में ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार एवं प्रसार के कारण हिन्दू धर्म बिखरता सा प्रतीत होने लगा। ऐसे में स्वामी जी ने धर्म समाज में व्याप्त रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों का विरोध करना ज्यादा जायज समझा। यही वजह थी कि स्वामी जी केवल वेद ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की सभी श्रेष्ठ परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इसी दौर में इन्होंने इस बात की स्थापना की कि वेदांत केवल हिन्दुओं का धर्म नहीं है अपितु यह सभी मनुष्यों का धर्म है। इस प्रकार विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को जाति तथा साम्प्रदायिक भावना से अलग करने की कोशिश की। स्वामी जी ने अपनी धार्मिक भावना का इजहार करते हुए कहा था-‘‘हमारे धर्म को रसोईघर में चले जाने का खतरा है। हमलोग न तो वेदांती हैं न पुरानी और न तांत्रिक ही, हमलोग महज छुआछूतवादी हैं। मेरा ईश्वर भोजन बनाने के बर्तन में है और मेरा धर्म है मुझे मत छुओ मैं पवित्र हूं। अगर अगली शताब्दी तक यही होता रहा तो हममें से प्रत्येक पागलखाने में होगा।’’ इस प्रकार विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों तथा संकीर्णताओं का विरोध करके इसे ज्यादा से ज्यादा उदार बनाने की कोशिश की। स्वामी ने स्वच्छ तथा आडंबर रहित जीवन को सच्चा सुख माना है। विवेकानन्द मानवतावादी थे।

स्वामी जी न सिर्फ धार्मिक बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महान थे। भारत में राजनीतिक चेतना को जगाने का काम भी इन्होंने काफी दिलचस्पी तथा लगन के साथ किया। उन्होंने देशवासियों को जगाने का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया। इनका यह मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर सेल्फ कांफिडेंस जैसी भावना का विकास होना जरूरी है। इसी क्रम में इन्होंने कहा, ‘‘अगर दुनिया में पाप है तो वह दुर्बलता है। हर तरह की दुर्बलता से बचो। दुर्बलता पाप है, दुर्बलता मृत्यु है। जो भी चीज तुम्हें शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक रूप में दुर्बल बनाती है उसे जहर की तरह तिरस्कृत करो। उसमें कोई जीवन नहीं है। वह सत्य नहीं हो सकती।’’

विवेकानन्द ने अतीत के मोह का भी काफी जमकर विरोध किया। इस प्रकार विवेकानन्द भारतीय राजनीति में पहला व्यक्तित्व था जिसने अतीत की महिमा के दिवास्वप्न को भ्रम कहा और देशवासियों को इससे अलग रखा। देश के नवयुवकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इन्होंने कहा था, ’’हे परमेश्वर! वह समय कब आयगा जब हमारे देश के लोग निरंतर अतीत में जीने की प्रवृत्ति से मुक्त होंगे।’’ इस प्रकार खासकर युवा वर्ग को इन्होंने अलग रखने को कहा।

गौर फरमाने की चीज है कि एक तरफ विवेकानन्द ने अतीत के मोह का विरोध किया, तो दूसरी तरफ इन्होंने पश्चिमी संस्कृति की अंधाधुंध नकल पर भी आपत्ति व्यक्त की। विवेकानन्द ने सीधे तौर पर अंग्रेजी राज का विरोध किया। देश की गुलामी उनके जीवन का सबसे बड़ा कष्ट थी। यूरोपीय संस्कृति की तुलना में भारत की मूल संस्कृति की आत्मा को ज्यादा श्रेष्ठ बताया। ध्यान देने की बात है कि विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ साबित करके भारत में राष्ट्रीयता जगाने की कोशिश की है। विवेकानन्द पहले व्यक्ति थे जिनमें हमें इस प्रकार की देशभक्ति देखने को मिलती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया, ‘‘भारत में ....मेरा प्राण है भारत के देवता मेरा भरण-पोषण करते हैं। भारत मेरे बचपन का हिंडोला मेरे यौवन का आनंदलोक और मेरे बुढ़ापे का बैकुण्ठ है।’’ विवेकानन्द ने भारत के प्रति अपनी असीम भक्ति दिखाते हुए कहा था कि ‘तुम्हारी भक्ति और मुक्ति की परवाह किसे है और कौन इसकी परवाह करता है कि तुम्हारे धर्मग्रंथ क्या कहते हैं। मैं बड़ी खुशी से एक हजार बार नरक जाने को तैयार हूं अगर उसमें देशवासियों को ऊंचा उठा सकूं।’

विवेकानन्द सच्चे अर्थों में संत थे। इन्होंने भारत की मूल संस्कृति तथा परंपरा को हमेशा जीवित रखने की कोशिश की। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आध्यात्मिक सूत्रों से दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने की कोशिश की। इस प्रकार यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि विवेकानन्द को दैनिक जीवन के अध्यात्म में विशेष आस्था थी।
प्रकाशन: आर्यावर्त , पटना , 10 जनवरी, 1988।

Tuesday, December 14, 2010

बुद्ध का स्त्री विमर्श

बुद्ध ने नर्तकी अंबपाली का आतिथ्य स्वीकार किया. कुछ लोग इस तथ्य के आधार पर साबित करना चाहते हैं कि बुद्ध तत्कालीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के विरुद्ध स्त्रियों के पक्षधर थे. बात ऐसी नहीं है. अंबपाली का स्वीकार उसी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अधीन वेश्यावृत्ति को मान्यता प्रदान करना था. कहना न होगा कि बुद्ध ने जब संघ स्थापित किया तो शुरू में उन्होंने दासों की तरह महिलाओं को उसमें आने नहीं दिया, उन्हें संघ में आने से बार-बार मना किया, उन्हें उसमें जगह नहीं लेने दी. जहां एक ओर बुद्ध और अन्य दूसरे लोग स्त्रियों का संघ में आने और जीवन का दूसरा रास्ता अपनाने का विरोध कर रहे थे, वहीं आनंद, जो बुद्ध के चचेरे भाई थे, जैसे लोग भी थे जो स्त्रियों के संघ में आने दिए जाने का समर्थन और उसके लिए तर्क कर रहे थे. कहना होगा कि बुद्ध को रास्ता दिखाया आनंद ने. संघ में स्त्रियों के आने के लिए जिसने बार-बार प्रश्न उठाया वह आनंद की मां थीं, प्रजापति गौतमी. जहां-जहां बुद्ध जाते थे, वहां-वहां वे बुद्ध के पीछे-पीछे जाती थीं. आनंद ने बुद्ध से पूछा कि ‘अगर औरतें कोशिश करें तो क्या वे निर्वाण प्राप्त कर सकती हैं?’ जवाब में बुद्ध ने कहा-‘हां’, इस पर आनंद ने कहा कि ‘तब फिर आप उन्हें संघ में क्यों नहीं आने देते?’ क्योंकि निर्वाण प्राप्त करने के लिए संघ में आना जरूरी था।

सच तो यह है कि आनंद उस संपूर्ण प्रकरण में स्त्रियों का एकमात्र सुभेच्छु था जो इस सिद्धांत में विश्वास रखता था कि स्त्री और पुरुष समान रूप से निर्वाण के हकदार हो सकते हैं. बुद्ध की मृत्यु के बाद अनेक अवसरों पर इस बात के लिए आनंद की निन्दा की गई थी. प्रथमतः, महाप्रजापति गौतमी के मामले में संघ में प्रवेश के सवाल पर और द्वितीयतः रोती हुई माता के बुद्ध के अंतिम दर्शन के अवसर पर (चुल्लवग , पृष्ठ 411). संपूर्ण बौद्ध साहित्य में आनंद के अलावे किसी दूसरे व्यक्ति का उल्लेख तक नहीं मिलता जो स्त्रियों का पक्षधर हो. यह आनंद के व्यक्तित्त्व का मानवीय पहलू हो सकता है, लेकिन इस तरह का कोई उल्लेख शायद ही मिलता है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि बुद्ध या बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार था. यहां अंगुत्तरनिकाय (खंड-२, पृष्ठ ७६) का वह प्रसंग उल्लेखनीय है जब आनंद स्त्रियों के दरबार में नहीं बैठने एवं शील-चर्चा के क्रम में उपस्थित नहीं रहने के प्रश्न पर बुद्ध से चर्चा करता है।

उस समय और उनके कायदे के अनुसार, इस प्रश्नोत्तर के क्रम में बुद्ध ने अंततः उन्हें संघ में आने दिया, लेकिन कायदे ऐसे बनाए कि संघ में भिक्षुणियों को भिक्षुओं के नीचे दबे रहना था। संघ को भिक्षु एवं भिक्षुणि इन दो संघों में बांटकर भिक्षु संघ को ऊपर का दर्जा दिया गया और भिक्षुणि संघ को उसके नीचे का। उन्होंने भिक्षुणियों के लिए दस शर्तें, नियम या कायदे बताए जिनके पालन के पश्चात ही औरतें संघ में आ सकती थीं। उनमें से एक बहुत ही चोट पहुंचानेवाला कायदा था कि चाहे जितनी भी वरिष्ठ भिक्षुणि हो उसके सामने चाहे जितना भी कनिष्ठ भिक्षु आ जाए, उसे उसको सलामी देनी पड़ेगी। भिक्षुणियों पर और भी कई सख्त प्रतिबंध थे। इसके साथ ही समान गलती के लिए भिक्षुओं की अपेक्षा भिक्षुणियों को अधिक सख्त दंड का भागी बनना पड़ता था। ऐसा आप कह ले सकते हैं कि यह औरत और मर्द के बीच स्थापित उच्च एवं निम्न के भेद को कायम रखने के लिए किया गया। इसका सीधा सा अर्थ था- औरतों को संघ के अंदर भी पुरुषों के दबाव में रखना।

स्त्रियों के प्रति बुद्ध के विचार को बौद्ध साहित्य में वर्णित गाथाओं के माध्यम से भी समझा जा सकता है। एक गाथा (कोलिय जातक,१३०) इस प्रकार शुरू होती है- ‘वह एक श्रद्धालु उपासक ब्राह्मण की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती थी. ... ब्राह्मण घर आता तो (रोग का) बहाना बनाकर लेट जाती। उसके बाहर जाने पर ‘‘जारों’’ के साथ गुजारती। वह ब्राह्मण बुद्धदेव का भक्त था-‘‘उपासक’’. (गृहस्थ बौद्ध को उपासक कहा जाता है)। वह ब्राह्मण तक्षशिला का स्नातक था और वाराणसी का प्रसिद्ध आचार्य भी था। सौ राजधानियों के क्षत्रिय राजकुमार उनके पास पढ़ा करते थे (देखें, मोहनलाल महतो वियोगी, जातककालीन भारतीय संस्कृति , पृष्ठ १४८).

एक दूसरे ब्राह्मण की स्त्री भी घोर दुश्चरित्रा थी। ब्राह्मण भी अपनी पत्नी के अनाचार को जानता था। जब ब्राह्मण व्यापार के लिए जाने लगा तो अपने दो पालित पुत्रों को सचेत करता गया- ‘यदि माता ब्राह्मणी अनाचार करें, तो रोकना।’ पालित पुत्रों ने जवाब दिया- ‘रोक सकेंगे तो रोकेंगे, नहीं तो चुप रहेंगे।’ जातक कथा में यह वाक्य है- ‘उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरंभ किया। घर में प्रवेश करनेवालों और निकलनेवालों की गिनती नहीं रही। ब्राह्मण का वह घर क्या था, पूरा वेश्यालय! उसके धर्मपुत्र भी उदासीन रहकर सब कुछ देखते रहे’ (राधजातक , १४५).

राधजातक (१७९) के अनुसार, ‘एक ब्राह्मण ने दो तोते पाले। ब्राह्मणी व्यभिचारिणी थी। ब्राह्मण तोतों को निगाह रखने का आदेश देकर व्यापार के उद्येश्य से कहीं चला गया। मौका मिलते ही ब्राह्मणी ने खुलकर अनाचार करना शुरू कर दिया।’

पुनश्च, ‘किसी ब्राह्मण की पत्नी दुश्चरित्रा थी। एक नट को उसने घर में बुला लिया। ब्राह्मण घर से बाहर गया हुआ था। ब्राह्मणी ने नट को भात-दाल पकाकर खिलाया। वह जैसे ही खाने बैठा कि ब्राह्मण आ गया। नट को ब्राह्मणी ने छिपा दिया। ब्राह्मण ने भोजन मांगा तो नट की जूठी थाली में थोड़ा-सा भात डालकर ब्राह्मण के आगे घर दिया। ब्राह्मण खाने लगा। एक नट भिखमंगा, जो दरवाजे पर बैठा सब कुछ देख रहा था, ने ब्राह्मण से सारी कथा कह दी’ (उच्छिट्ठभत्त जातक , २१२).

एक गाथा ऐसी है जिसमें बतलाया गया है कि एक ब्राह्मणी युवती ने अपने तुरंत के ब्याहे महापराक्रमी पति का खून डकैत सरदार के हाथ में तलवार पकड़ाकर करा दिया। उन्चास तीरों से उन्चास डकैतों को उस पराक्रमी ने ब्राह्मण ने मार गिराया। पचासवां व्यक्ति था डाकू-सरदार। अब ब्राह्मण के पास तीर न था। उसने डाकू सरदार को पटक दिया और अपनी स्त्री से तलवार मांगी। स्त्री उस डाकू-सरदार पर पहले ही मुग्ध हो चुकी थी। उसने तलवार डाकू-सरदार को पकड़ा दी और उस डाकू ने ब्राह्मण पर वार कर दिया। डाकू-सरदार के पूछने पर ब्राह्मणी ने कहा, ‘मैंने तुम पर आसक्त हो अपने कुल-स्वामी को मरवा दिया।’ वह डकैत भी ब्राह्मण ही था; क्योंकि उस ब्राह्मणी ने उसे ‘बाह्मण’ कह पुकारा था-‘सब्बं भण्डं समादाय पारं तिण्णोसि ब्राह्मण।’ (चुल्लधनुग्गह जातक , ३७४).

एक ब्राह्मणी ऐसी थी जिसने अपने पति को भीख मांगकर धन जमा करने के लिए बाहर भेज दिया और खुद अनाचार में लिप्त हो गई। धन कमाकर ब्राह्मण जब लौटा, तब ब्राह्मणी ने उस धन को अपने उपपति को दे दिया (सत्तुभस्त जातक , ४०२).

जातकों में उल्लिखित तथ्य एवं निष्कर्ष से भी स्त्रियों की सामाजिक हैसियत एवं उसके प्रति बुद्ध के विचार पर प्रकाश पड़ता है. बुद्ध, बोधिसत्व के रूप में एक बार भी मादा योनि में जन्म नहीं लेते हैं. पशु या मनुष्य दोनों ही कोटि के जीवों में वे नर रूप ही धारण करते हैं. बुद्ध सदैव स्त्रियों को घृणित, दुर्गंधयुक्त एवं व्यभिचारी बताते पाये जाते हैं. ( डॉक्टर अशोक कुमार, बौद्ध परंपरा में स्त्रियों का स्थान , पोस्ट डॉक्टोरल थीसिस,आई .सी एच .आर .हेतु शोधरत). बुद्ध की स्पष्ट घोषणा है कि वह देश रहने योग्य नहीं है जहां स्त्री शासक है (कंडिन जातक ) . स्त्रियां आम तौर पर असंगत और पापिणी प्रकृति की होती हैं (असात्मंत्र जातक ). स्त्रियों की प्रकृति एवं चरित्र संदिग्ध है (अंडभूत जातक). बोधिसत्व लोक-प्रसिद्ध आचार्य के रूप में अपने शिष्यों को उपदेश देते हैं कि आमतौर पर स्त्रियां व्यभिचारिणी होती हैं. अतएव बुद्धिमान पुरुष के लिए यही उचित है कि उसकी प्रकृति को समझें, घृणा न करें। स्त्रियां उस धर्म-स्थल की नदी के समान होती हैं जहां साधु और चांडाल दोनों स्नान करते हैं (अनभिरत् जातक )।

जातकों के अलावे भी बौद्ध साहित्य में ऐसे अनेक प्रसंग आये हैं जो स्त्रियों के प्रति बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के नजरिये को स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हैं। कहना होगा कि सर्वत्र स्त्रियों को काला नाग, दुर्गंध, व्यभिचारिणी और पुरुषों को फांसनेवाली कहा गया है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-1, पृष्ठ २६३). स्त्रियों को रहस्यमयी कहा गया है. स्त्रियां अपने दुर्गुणों एवं दुराचारी प्रवृत्ति के कारण सामाजिक कर्मों में हिस्सेदार नहीं हो सकती थीं। महत्त्वपूर्ण है कि स्त्रियों के संबंध में ये विचार किसी एक स्त्री को ध्यान में रखकर नहीं व्यक्त किये गये थे, बल्कि स्त्रियों की प्रकृति पर विचार करते हुए सामने आये हैं।

इस तरह, हम पाते हैं कि बौद्ध साहित्य में स्त्रियों के इर्द-गिर्द जिस तरह की घेराबंदी कर दी गई थी, उससे पूर्ववर्ती एवं परवर्ती ब्राह्मण साहित्य की मान्यताओं का अनायास स्मरण हो आता है, जहां स्त्रियां अपने पति और पुत्र की निगरानी में ही सुरक्षित रह सकती थीं। बौद्ध साहित्य भी इस बोध से परे नहीं है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-२, पृष्ठ ७६). स्त्रियों की मूल भूमिका पति की विश्वासी सेविका की थी (वही, खंड-३, पृष्ठ २४४,३६१-६७). स्त्रियों के स्वतंत्र अस्तित्त्व एवं स्वतंत्र दायित्त्व के अस्तित्त्व की कल्पना का घोर अभाव उसे घर और पितृसत्तात्मक मूल्यों से ही बंधे रहने को प्रेरित करता था। स्वयं बुद्ध की नजरों में भी यह कल्पना से परे था कि कोई स्त्री तथागत या चक्रवर्ती भी हो सकती है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-१, पृष्ठ २९).

अतएव विचारणीय प्रश्न है कि सामाजिक-धार्मिक जीवन में हिस्सेदारी से स्त्रियों को अलग/वंचित रखकर किस प्रकार बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार हो सकता था ?




Monday, December 13, 2010

सवाल वेदों की भाषा का है

मैं पिछले कई सालों से एक सवाल से अपने को बेहद घिरा महसूस कर रहा हूँ। सवाल वेदों की भाषा से सम्बंधित है। कहना होगा कि इस दौरान मैंने कुछ देशी–विदेशी विद्वानों को भी पढ़ा। मेरी सूची में ए. बी. कीथ, मैक्स मूलर, मौरिस विन्तर्निज और रामविलास शर्मा प्रमुख रूप से शामिल रहे हैं. इनलोगों ने मेरी मदद नहीं की बल्कि समस्या को और जटिल ही बनाया. बल्कि मैं यह कह सकता हूँ कि इन विद्वानों के अध्ययन से अपने सवाल को लेकर मेरा जो एक विश्वास था वह कमजोर ही हुआ है. सब ने एक मत से वेदों की भाषा का बखान किया है-कभी-कभी तो वे मुग्ध भी लगते हैं.

दूसरी तरफ मैं पता हूँ कि वैदिक समाज की भाषा एक वैसे दौर में है जहां अनेक चीजों के लिए एक शब्द प्रयोग में लाया जा रहा है। उदहारण के तौर पर ‘मृग’ शब्द को लिया जा सकता है जिसका मूल अर्थ पशु था जो मलयालम में आज भी सुरक्षित है, लेकिन सामान्य अर्थ से विशेष अर्थ की ओर भाषा की प्रगति के कारण इसका अर्थ एक विशेष पशु हो गया। वास्तव में मृग का मूल अर्थ था–जिसे ढूंढा जाये (मृग्यते इति मृगः). मृगया में शिकार सम्बन्धी अर्थ और मृगेन्द्र, मृगराज (पशुओं का राजा सिंह), शाखामृग (बन्दर),मृगहस्तिन (हाथी) में पशुमात्र का अर्थ अब भी सुरक्षित है. मुझे यह देखकर लगभग आश्चर्य होता है कि संस्कृति के पुरोधा, अर्थात स्वयं मनुष्य के लिए भी कभी–कभी मृग शब्द से ही काम चलाया जा रहा है. ‘गो’ शब्द का भी कुछ ऐसा ही हाल मिलता है. मैंने इस शब्द की गिनती तो कभी की नहीं लेकिन बीस से भी ज्यादा चीजों के लिए प्रयुक्त होते स्पष्ट तौर से देखा है.

इस तरह के जो साक्ष्य हमें प्राप्त हैं वे बताते हैं कि आरंभिक संस्कृत की शब्द-सम्पदा निर्माण के क्रम में है. उनके समक्ष विवशता है कि एक शब्द का व्यवहार अनेक भौतिक वस्तुओं के लिए करें. बावजूद इसके विद्वान वेदों की भाषा पर मुग्ध हैं. मेरा सवाल यही है कि ये दोनों ही स्थितियां एक साथ संभव हैं क्या ? या कि कोई तीसरी ही स्थिति है ?

Saturday, November 20, 2010

आखिर किसे कहोगे क्रूरता ?

जब भी मुझसे कोई क्रूरता की शिनाख्त करने को कहता है तो मैं अपने को बेहद उलझा हुआ महसूस करता हूं। विचार थिर होने का नाम ही नहीं लेते। समझ में नहीं आता कि किसे क्रूरता की श्रेणी में रखूं और किसे बख्श दूं। दिमाग में ऐसा गड्डमड्ड होता है कि आखिर को मैं फिर से सवाल पर लौट आता हूं कि आखिर किसे कहोगे क्रूरता ? लेकिन इस दौरान जो कुछ चित्र बनते हैं, दृश्य उपस्थित होते हैं, वे अर्थकर लगते हैं।

बचपन की वो धुंधली यादें हैं जिनमें मेरे दरवाजे पर कोई अपरिचित पहुंचता तो दादाजी पहले और अंतिम सवाल की तरह पूछते ‘आपका आश्रय (मूल में यह शब्द वर्णाश्रम या फिर आश्रम रहा होगा) कौन-सा है ?’ यद्यपि उन दिनों यह बात कुछ बुरी नहीं लगती थी क्योंकि मुझे सवाल ही समझ में न आते थे। लेकिन इतना अवश्य समझता था कि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्थानों पर बैठाते एवं उनके साथ पेश आने के उनके तरीके भी अलग-अलग होते थे। कुछ खास लोग ही होते जिनकी पहुंच खाट या चौंकी तक हो पाती वरना अधिकतर तो मिट्टी ही की फर्श पर बैठकर अपने को धन्य समझते। प्राचीन इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते जब मैंने प्राचीन समाज-व्यवस्था में इसी तरह की बंदिशें शूद्रों और महिलाओं के संदर्भ में देखीं और उसे अमानवीय पाया तो अपने दादाजी के ‘सदाचार’ का अर्थ समझ में आया। बहुत ही सरल, सहज और अल्पज्ञात दादाजी अक्सर कहते ‘हिंदू बढ़े नेम से मुसलमान बढ़े कुनेम से।’ इसका भी ध्वन्यार्थ अब ही जाकर समझ में आया है।

फिर मैंने पिता को देखा। अत्यंत छोटे किसान। एक बड़े संयुक्त परिवार में अपने हिस्से की उतनी ही जमीन जितनी पिता खेत में काम करनेवाले एक हलवाहे को देते थे। मैंने अक्सर पाया कि मजदूर अगर काम से लौटकर अपनी मजदूरी की मांग करता तो पिता खुदरा पैसे (रेजगारी) न होने की बात कह मजदूर को अगले दिन के लिए टाल देने की भरसक कोशिश करते। मुझे अपने पिता की यह बात बहुत बुरी लगती। इधर कई सालों तक लगातार मैंने पब्लिक स्कूलों में पढ़ाया और कई तरह के अनुभवों से अपने को समृद्ध होता पाया। पटने के पब्लिक स्कूलों में मालिक हमेशा शिक्षकों को वेतन देने में टाल-मटोल करते हैं। शायद कोई मौद्रिक लाभ होता है इससे। और तो और यह भी परंपरा है कि शिक्षकों को चेक के द्वारा मालिक से वेतन-भुगतान होता है और एक नियत राशि अपने पास रखकर शेष राशि शिक्षक पुनः मालिक को लौटा देता है। पब्लिक स्कूलों की बात रहने दें। सरकारी शिक्षकों एवं अन्य सरकारी कर्मचारियों की बात करें। क्या उनके हिस्से के पैसे रोककर नहीं रखे जाते ? आज कितने लोगों को यह बात क्रूरता या क्रूरता-सी लगती या लग सकती है ?

इधर हाल तक एक गीत की कुछ पंक्तियां मुझे सुनायी पड़ती रही हैं। मैं कभी गाने का कोई शौकीन नहीं रहा इसलिए उसका गद्यार्थ ही आपको कह सकता हूं। भावार्थ है कि मुझसे प्रेम न करो कोई बात नहीं लेकिन किसी और को चाहने पर मुश्किल होगी। मैं गीत के इस टुकड़े पर बार-बार रूकता रहा हूं और सोचता हूं कि क्या यह वही या कुछ-कुछ उसी के जैसा है जिसे आप क्रूरता कहते हैं ? हाल ही की बात है कि मैं एक महिला मरीज को लेकर आंख के डाक्टर के पास गया हुआ था। उस मरीज को निकट-दृष्टि-दोष था। डाक्टर ने आंखों की जांच के उपरांत बताया कि यह बीमारी दूर की चीजों को न देखने के अभ्यास की वजह से पैदा हुई है। पहली दफा में तो मैं इस बात का मतलब ही नहीं समझ पाया। कई दिनों के निरंतर प्रयास के बाद जाकर इसका मर्म समझ में आया। क्या आपको लगता है कि पुरुष प्रधान समाज की यह भी कोई क्रूरता है जहां एक औरत को महज देखने तक का भी अधिकार नहीं है। क्या गांधारी की आंखों की पट्टी सिर्फ गांधारी के लिए थी या प्रतीक रूप में संपूर्ण महिला वर्ग के ऊपर लगी बंदिश को प्रतिबिंबित करती है ? एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में कुल नेत्रहीनों तथा मोतियाबिंद के शिकार लोगों में से दो तिहाई महिलाएं हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ रोग विशेषज्ञ डा. लीवी एस मूर्ति ने कहा कि विश्व भर में नेत्र रोगों तथा नेत्रहीनता के शिकार लोगों में से महिलाओं की संख्या सर्वाधिक होने का एक प्रमुख कारण यह है कि महिलाओं और लड़कियों के उपचार में भेदभाव बरता जाता है जिसे बंद किया जाना चाहिए। आनेवाले समय में लड़कियां अगर आंखों की रोशनी के बगैर पैदा हों तो क्या आश्चर्य!

बल्कि हमने तो प्रबंध कर रखा है कि लड़कियां पैदा ही न हों। एक समय था कि लड़की के पैदा होते ही उसे मार डालने के उपक्रम पर विचार होने लगता था। आज हम ‘मध्ययुगीन बर्बरता’ कहते हुए उसकी भर्त्सना करते हैं। भला क्यों नहीं! आधुनिक/उत्तर आधुनिक समय में हमारी क्रूरता भी आधुनिक/उत्तर आधुनिक होनी चाहिए! नये जमाने के नये औजार। आज हम उसकी हत्या जन्म लेने से पहले करते हैं। बिल्कुल थोड़ी-सी सावधानी जीवन भर आसानी वाली शैली में। इसलिए भी कि जन्म लेने के बाद हत्या करने पर न चाहने पर भी थोड़ी-बहुत चिल्ल-पों हो ही जाया करती है। आपको याद ही होगा कि रूपकुंवर सती-कांड के दौरान और बाद में भी इस ‘भद्रजनीय’ समाज ने कितना गला फाड़ा था। इसलिए ज्यादा बखेड़ा खड़ा करने की परेशानी से बचने के लिए ही लोगों ने कन्या-भ्रूण-हत्या जैसी चीज की ईजाद की। इस खोज ने मीडियाकर्मियों को भी चपत लगाई है। बेचारे सतीकांड का लाइव टेलीकास्ट दिखाने से वंचित रह जायेंगे।

इस क्रूरता को आधुनिक कहने का एक बाजिव तर्क यह भी है कि आधुनिकता का पाठ पढ़े लोगों के बीच यह पद्धति कुछ ज्यादा ही प्रचलित है। आंकड़े बताते हैं कि कन्या-भ्रूण-हत्या की दर गांवों से ज्यादा नगरों की एवं नगरों से ज्यादा महानगरों की है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ वाले देश की संसद जिस नगरी में लगती है, इसकी दर सबसे ज्यादा है। इससे भी ज्यादा पुष्ट प्रमाण यह है कि दिल्ली के उन इलाकों में कन्या-भ्रूण-हत्या ज्यादा है जहां के लोग ज्यादा शिक्षित/आधुनिक हैं। जिनकी शिक्षा जितनी अधिक व आधुनिक है वे उतने ही अधिक इस तरकीब का प्रयोग करते हैं। कुछ दिनों पहले जब मैंने एक दिल्लीवासी से कहा कि दिल्ली के विश्वविद्यालयों तक में यौन-शोषण/यौन-उत्पीड़न होता है तो कहने लगे ‘दरअसल बिहार में यह सब ज्यादा होता है लेकिन दबा-दबा रहता है। दिल्ली में चूंकि राजनीतिक चेतना ज्यादा है इसलिए प्रकट हो जाता है।’ उस देश में जहां पालतू जानवरों तक को जोड़ा में रखने का विधान है; यानी अगर आप केवल नर या केवल मादा पालते हैं तो कानून की नजर में आप अपराधी हैं। संवेदना की ऐसी पराकाष्ठा! और दूसरी तरफ कन्या-भ्रूण-हत्या। इसे क्या कहेंगे आप ?

कुछ साल पहले तक मेरे एक मित्र हुआ करते थे। नाम था शैलेन्द्र कुमार। कुमार साहब ने एक दिन आंख के डाक्टर के पास साथ चलने को कहा। मैं गया भी। डाक्टर ने उन्हें चश्मे का प्रयोग करने की सलाह दी। चश्मा बनवाया गया। अब उसे पहनने की बारी थी इसलिए पिता को पहले ही से तैयार करना जरूरी था। उन्होंने पिता को चश्मा दिखाया। पिता ने चश्मा अपने कब्जे में कर लिया और रोजाना एक किलो पालक साग खरीदकर लाने का आदेश दे डाला। मेरे मित्र बेचारे चश्मा नहीं पहन पाये। बाद में उनकी आंखों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम क्योंकि फिर हम अलग रहने लगे। मैंने पब्लिक स्कूल में भी एक मुस्लिम छात्र को पिता के भय से चश्मा न पहनने की बात देखी थी। खुद मैं जब पहली बार ऐनक के साथ घर गया और अंधेरे में पड़ी बाल्टी से टकरा गया तो एक आदमी ने टिप्पणी की थी ‘रातो में चश्मा पहने के कउन सौख है।’ यह सुनकर जो मुझे गुस्सा आया था उसकी कल्पना आप नहीं कर सकते। पत्नी को चश्मा पहनवाने में भी मुझे मशक्कत करनी पड़ी। गांव में जरूरतमंद लड़कियां केवल इस डर से चश्मा नहीं लगातीं कि शादी तय होने में यह बात परेशानी पैदा कर सकती है। ऐसे में उन लड़कियों की आंखों का क्या होता होगा शायद आप भी समझते होंगे। गांव में मेरे पड़ोस में एक लड़की है जिसकी चश्मा न लगाने की वजह से आंख ही बैठ गई। हमें अपने बचपन की वो बात याद है जब चश्मा पहनने वाले किसी भी आदमी को ‘चश्मा-चश्मल्लू’ कह चिढ़ाते। उन दिनों बच्चों का यह एक प्रिय खेल की तरह होता। क्या इसे भी आप क्रूरता ही कहेंगे ?

मैंने श्रीकांत वर्मा की पत्नी का कभी किसी पत्रिका में संस्मरण पढ़ा था। उसमें श्रीकांत वर्मा की बीमारी (अंतिम दिनों की) और मृत्यु का हाल छपा था। कवि श्रीकांत वर्मा बीमार थे और सरकारी खर्चे से शायद इंगलैंड में इलाज चल रहा था। बीमारी कुछ ऐसी थी कि डाक्टर ने बचने की किसी भी संभावना से इनकार कर रखा था। साथ ही उन्हें असह्य पीड़ा भी थी। पत्नी को भी उनकी पीड़ा असह्य लगी और डाक्टर एवं दवा की सहायता से कवि को उस पीड़ा से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया गया। इस बात को पढ़ते हुए मुझे एक मानसिक आघात-सा लगा था लेकिन जल्द ही संभल गया। पत्नी द्वारा लिया गया निर्णय मुझे बौद्धिक एवं साहसपूर्ण लगा था। भारतीय कानून एवं मानस के लिहाज से यह एक जघन्य अपराध था। यहां आज भी इच्छा-मृत्यु का अधिकार नागरिकों को प्राप्त नहीं है। इसकी बात तो दूर ही रखें। गरीबी, भुखमरी, कुपोशण आदि तक को आप किसी व्याधि का नाम जीवित रहते नहीं दे सकते। शायद उसके लिए आपको पहले मृत्यु-प्रमाण-पत्र हासिल करना होगा। नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान ’ का शायद यही निहितार्थ है। आप भूख से मरें किंतु भुखमरी का नाम न लें। अगर ऐसा करते हैं तो आप दंडनीय अपराध करते हैं। इसके लिए भारतीय दंड संहिता का विधान है। आपके बच्चे अगर विकलांग पैदा होनेवाले हैं, और आप पालने में असमर्थ हैं तो सामूहिक आत्महत्या करें। दूसरा कोई विकल्प नहीं। भारतीय कानून आपको ‘क्रूर’ होने का अधिकार प्रदान नहीं कर सकता !

कुछ साल हुए जब कुंभकोणम में सैकड़ों स्कूली बच्चे जलकर बुरी तरह से मरे थे। बच्चों के बीच खासे ‘लोकप्रिय’ तत्कालीन वैज्ञानिक राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद की उन्हीं दिनों अंग्रेजी अखबार ( (संभवतः ‘दि हिन्दू’ ) में एक कविता आई थी जिसमें ईश्वर से प्रार्थना थी कि उन बच्चों के अभिभावकों को वे दुख बर्दाश्त करने की ताकत दें। इस कविता को पढ़कर मेरा सिर भन्ना गया था कि एक राष्ट्रपति, जिसे मालूम है कि दुख के कारण क्या हैं और जिन्हें वह चाहे तो पल भर में दूर कर सकता है, वह हिंदी कवियों (अपवाद यहां भी हैं ) की तरह कविता लिखने बैठा है ! मुझे नहीं मालूम कि आप क्या सोचते हैं। इस क्रूरता की शिनाख्त आपने की अथवा नहीं?

सन् 1997 के इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में अशोक वाजपेयी का प्रकाशित संस्मरण ‘तुम भी, मैं भी आदमी’ पढ़कर मन कड़वाहट से भर गया था। वाजपेयी जी, मुक्तिबोध के साथ रेल-यात्रा पर हैं। उन्होंने लिखा है, ‘बीच में जब मानिकपुर स्टेशन आया तो जाड़े की रात और ठंडी हो चुकी थी। वहां जंक्शन होने के कारण गाड़ी काफी देर ठहरी। हमलोग इलाहाबाद से रात के खाने का कोई इंतजाम कर के नहीं चले थे। मुक्तिबोध ने कहा, ‘‘पार्टनर, आपने स्टेशन पर मिलने वाली पूरी-सब्जी कभी खाई है। बड़ी स्वादिष्ट होती है, चलिए लाते हैं।’’ हम दो दोनों में आलू की सब्जी और पूरियां ले आए। आलू की सब्जी रसेदार थी और उसमें रसाधिक्य इतना था कि तलहट में कहीं कुछ आलू होने का संदेह जरूर होता था पर वह वहां भी था नहीं। पूरियां किसी कदर ठंडी, चीमड़ और खासी सख्त थीं, मैंने देखा मुक्तिबोध बहुत स्वाद लेकर उन्हें रसे में भिगोकर खा रहे थे। मुझसे इतनी सख्त पूरियां चबाई ही नहीं जा रही थीं। पर उस बारे में कुछ कहना बल्कि उन्हें पसंद न कर पाना मुक्तिबोध के आगे मुझे कुछ अश्लील-सा लगा। मैंने थोड़ा-बहुत खाकर उनकी नजर बचाकर बाकी चलती ट्रेन की खिड़की के बाहर फेंक दी। थोड़ी देर बाद जब उन्होंने यह लक्ष्य किया कि मेरे हाथ खाली हैं तो बोले कि ‘‘आप जल्दी खा गए-स्वादिष्ट इतनी है कि क्या कहा जाए।’’ तब यह पढ़कर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा था। आज की बात आप जाने।

महादेवी वर्मा ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के घर का हाल लिखा है। उनके घर का रिवाज था कि कोई अतिथि घर आते तो उनकी पत्नी पैर छूकर प्रणाम करतीं। उनकी इस अतिरिक्त की शिष्टता से रीढ़ की हड्डी ने सीधा रहने से इनकार कर दिया था। संभव है कि यह भी आपको सदाचार का एक अति सामान्य और शिष्ट नियम लगे लेकिन मुझे ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से क्रूरता की गंध आती है। मजेदार बात यह है कि इन बातों का हमें इस कदर आदती बना दिया जाता है कि इसमें कोई बुराई नजर ही नहीं आती। स्वयं भोक्ता को भी नहीं। आपको यह जानकर कितनी तसल्ली होगी कि बिल्कुल हाल के एक सर्वेक्षण से यह बात उभर कर आई है कि पत्नियां अपने पति द्वारा पीटे जाने को तनिक बुरा नहीं मानती हैं। मैं तो कहूंगा कि यह क्रूरता की पराकाष्ठा है इस खतरे को भांपते हुए कि आप मुझे मनोरोग का ‘केस’ न समझ लें। अगर नहीं, तो आखिर किसे कहोगे क्रूरता?

प्रकाशन : मनोवेद डाइजेस्ट, अक्तूबर-दिसंबर, 2009