Friday, January 8, 2010

कहां है चित्रकला आलोचना की भाषा...?



इन दिनों कला आलोचना की भाषा मेरी चिंता में शामिल रही है। कई बार तो ऐसा लगता है, और जो शायद बिल्कुल सही भी है कि इतने सारे कला आन्दोलनों के बाद भी भारत के चित्रकला समीक्षकों ने आलोचना का अपना कोई निश्चित प्रतिमान नहीं गढ़ा है। यह कला आंदोलनों के इकहरेपन का भी स्पष्ट संकेत है।

चित्रकला आलोचना की अपनी कोई भाषा विकसित हो सकी इसके बहुत सारे संभव कारण हो सकते हैं, लेकिन जो एक-दो महत्वपूर्ण कारण रहे हैं, उन पर केंद्रित होकर अगर निश्चित और सही परिप्रेक्ष्य में बात शुरू की जाए तो उसकी वाजिब समस्याओं से हम परिचित हो सकते हैं और उसकी चुनौतियों को स्वीकार करने का साहस भी दिखा सकते हैं।

कहना होगा कि हमारे यहां कला के क्षेत्र में सबसे विकसित विधा साहित्य है, इसलिए अन्य कला-माध्यमों विधाओं पर भी इसके अपने प्रभाव हैं। इस प्रभाव को चाहकर भी रोका नहीं जा सकता। भारत में अब तक के अधिकतर चित्रकला समीक्षक प्रथमतः या मूलतः साहित्यकार रहे हैं। साहित्य-साधना उनकी मुख्य चिंता रही है- चाहे वे प्रयाग शुक्ल हों या फिर विनोद भारद्वाज, लगभग सारे ही लोग अपना अधिकांश समय साहित्य ही को देते रहे हैं। निश्चित रूप से चित्रकला माध्यम को इन लोगों के देखने-परखने का ढंग साहित्यिक गतिविधियों, आचरणों और चिंतनधारा से अप्रभावित नहीं होगा।

अब तक चित्रकला आलोचना की मजबूरी रही है कि साहित्य के अंदर जोवाद’, ‘धारायाप्रतिमानप्रचलन में रहे हैं, यहां भी ठीक उन्हीं जुमलों को दुहरा दिया जाता रहा है। इससे ऐसा लगता है कि चित्रकला समीक्षा मूल रूप में भारतीय हिन्दी साहित्य की नकल या रूपांतरण है। दुर्भाग्य कहिए कि हिन्दी आलोचना जगत के प्रतिमानों के आधार पर ही भारतीय चित्रकला का भाग्य-निर्धारण वर्षों से होता चला रहा है।

प्रयाग शुक्ल जबसमकालीन कलापत्रिका के एक अंक में रामकुमार की चित्रकृतियों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे थे तो लगा जैसे वे महज साहित्यिक लेखा-जोखा ही दे पा रहे हों। संयोग ही कहिए कि रामकुमार एक अच्छे कहानीकार भी हैं और चित्रकला की दुनिया में भी एक बेहतर पहचान है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि रामकुमार की कहानियों, उनके उपन्यासों को आधार बनाकर या ठीक उसी के सांचे में उनकी चित्रकला का भी मूल्यांकन किया जाये। हमारा यह मानना कभी नहीं हो सकता कि एक कलाकार के लेखन-कर्म से, उसके दस्तावेजों और संस्मरणों से हम उनकी कला को जानने-समझने में कोई मदद नहीं ले सकते। इससे बचने की कोशिश से उतना ही बड़ा अनर्थ होगा, जितना कि उसके साहित्य में व्याप्त निराशा, ठहराव और पस्तहिम्मती को हू--हू उनकी पेंटिंग में इंगित कर देना। दोनांे ही प्रवृत्तियां घातक हैं। अतः इनसे भरसक बचने की कोशिश होनी चाहिए।

रामकुमार की चित्रकृति का विश्लेषण प्रस्तुत करते प्रयाग शुक्ल इसी प्रवृत्ति के शिकार हुए हैं। हम ऐसा भी नहीं कह सकते कि एक ही आदमी अगर साहित्य और चित्रकला पर साथ-साथ काम कर रहा हो तो दोनों कला-माध्यम एक दूसरे से अप्रभावित रह सकेंगे। और षायद यह भी कि वैसे में एक कला-माध्यम दूसरे कला-माध्यम का महज रूपांतरण अथवा अनुवाद होगा। प्रायः प्रत्येक कला की अपनी एक सीमा-रेखा होती है, जिसके परे सभी एक-दूसरे से संपर्क कायम रखते हुए भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हैं।

चित्रकला और साहित्य की प्रकृति में भिन्नता है। साहित्य के साथ सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसके व्यापक प्रकाशन-प्रसार की वजह से प्रत्येक पाठक उसे खरीदकर अपने पास रख सकता है। अपनी इच्छा और सुविधा के मुताबिक उसे पलटकर देख-पढ़ भी सकता है। किसी भी टेक्स्ट के साथ मजेदार बात यह है कि जब भी हम उसे पढ़ते हैं, एक नये सिरे से हमारा उसके साथ संवाद शुरू होता है। प्रायः हर बार हमारे ज्ञान में कुछ कुछ इजाफा होता ही है, नये-नये आयाम और अर्थ उद्भाषित होते हैं। चित्रकला के साथ यह सुविधा नहीं है। किसी चित्रकृति के बारे में जब भी हम बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं, उसका अर्थ-भेद खोलना चाहते हैं, समस्या ज्यों की त्यों बनी की बनी ही रह जाती है। दर्शक जब कला-प्रदर्शनियों में एक बार आता है तो पहली ही नजर में किसी कलाकृति के बारे में सोच-जान लेता है-ऐसा नहीं है।

यहां एक अदना दर्शक ही की बात नहीं है बल्कि कभी-कभी बड़े कलाकार या कला-समीक्षक भी हतप्रभ रह जा सकते हैं। और ऐसा संभव है। आनन-फानन में कोई निर्णय देना या राय बनाना मुश्किल ही नहीं कई बार असंभव भी हो जाता है। कलाकृति के साथ बार-बार संवाद स्थापित करने की कोशिश ही इस तरह की संवादहीनता और चुप्पी को खत्म कर पाने में समर्थ हो सकती है। कलाकारों के पास इतनी सामथ्र्य नहीं है कि वे व्यक्तिगत खर्च के आधार पर वैसी चित्रकृतियों को व्यापक दर्शक के समक्ष प्रस्तुत कर सके। भारत जैसे मुल्क में तो ऐसी कृतियां हमारे एलीट बुद्धिजीवियों के बेडरूम ही की शोभा बढ़ाती रह जाती हैं-कला-दीर्घा पहुंचने का भला सौभाग्य कहां !

सच्चाई यह भी है कि अब तक हमारे बीच यह रिवाज ही नहीं कायम हो पाया है कि लोग कला-प्रदर्शनियों में ठीक उसी ढंग से आया-जाया करें जैसा वे सिनेमा हॉल और थियेटरों के साथ बरतते हैं। इसका बहुत कुछ संभव कारण यह भी रहा है कला को लोगों ने मुख्यधारा से बिल्कुल ही अलग काटकर रखा है। इसे विशुद्ध रूप से एलीट संस्कुति का सवाल माना जाता रहा है। इस तरह की अवधारणा के बाद आम जनता के पास वैसी कोईसांस्कृतिक गरिमानहीं होती जिससे वह इन विशुद्ध बौद्धिक और भद्रलोकीय कलाकारों कीश्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासतके ढोंग को मात दे सके। आम लोगांे के बीच कला के बारे में यह धारणा किकला वही जो समझ से परेहो-कलाकारों कीअति बौद्धिकहो चुकी दुनिया से आम-जन के निष्कासन ही को अभिव्यक्त करती है।

जब भी चित्रकला से संबंधित कोई लेख पढ़ने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ तो पाया कि उसमें कलाकृतियों का साहित्यिक विश्लेषण ही प्रमुखता पा गया। कृति के शिल्प,उसकी तकनीक पर तो जैसे कोई बात ही नहीं करता। उसकी शैलीगत विशेषताओं पर तो कला-समीक्षकों की नजर तक नहीं जाती। उनका सारा जोर इस बात को साबित करने पर होता है कि वह किसी महत्वपूर्ण भाव अथवा थीम को अभिव्यक्त कर रहा है। क्या महज भावों की अभिव्यक्ति ही किसी चित्रकृति के लिए सब कुछ है?

लगभग सारे कला-समीक्षक अघोषित रूप से इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं कि चित्रकला में चूंकि शब्द नहीं होते, इसलिए विचार का इसमें अन्य कला-माध्यमों की तुलना में कुछ ज्यादा ही अभाव पाया जाता है। फिर भी कला-आलोचक विचार और विचारधारा की ठूंस-ठांस ही से काम चलाते हैं। यहां भी हम साहित्यिक विधाओं की आलोचना के प्रतिमानों,औजारों ही से काम चलाते हैं। हमारे समक्ष यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है,जिससे हमारी चित्रकला-आलोचना को टकराना ही होगा,उसकी चुनौतियों को स्वीकार करने का साहस प्रदर्शित करना होगा। बगैर इसके,चित्रकला-आलोचना की एक स्वतंत्र भाषा गढ़ने, उसे विकसित करने में सदैव असमर्थ साबित होते रहेंगे।

Monday, January 4, 2010

एक गधा जब नेहरू से मिला...

(नेहरु और गधे की ऐतिहासिक बातचीत)



मैंने लोगों से सुन रखा था कि पंडितजी से मुलाकात का समय सुबह साढ़े सात-आठ बजे से पहले का है। उसके बाद जो मुलाकातियों का तांता शुरू होता है तो फिर किसी समय भी एक-आध मिनट के लिए बात करना असंभव होता है। यही सोच कर मैं उस दिन रात-भर जागता रहा और विभिन्न रास्तों से घूम-फिर कर पंडितजी की कोठी तक पहुंचने का प्रयत्न करता रहा। कोई छह बजे के लगभग मैं उनकी कोठी के बाहर था। संतरियों ने मेरी ओर लापरवाही से ताका। शायद मैं उन्हें बिल्कुल मामूली गधा नजर आता होऊंगा। पहले तो मैं दीवार से लग कर धीरे-धीरे घास चरता रहा और धीरे-धीरे दरवाजे की ओर सरकता रहा। जब मैं दरवाजे के बिल्कुल निकट पहुंच गया तो संतरियों ने हाथ उठा कर लापरवाही से मुझे डराया जैसे आम तौर पर गधों को डराया जाता है। मैंने सारी योजना पहले से सोच रखी थी। उनके डराते ही मैंने कुछ यह प्रकट किया कि मैं बिल्कुल डर गया हूं। अतएव मैं तड़प कर उछला और सीधा कोठी के भीतर हो लिया। संतरी मेरे पीछे भागे। वे मेरे पीछे-छे और मैं उनके आगे-आगे। जब मैं बाग तक जा पहुंचा तो संतरियों ने एक गधे का वहां तक पीछा करना व्यर्थ समझ कर माली को आवाज दे दी कि वह मुझ गधे को बाग से बाहर निकाल दे और यह कह कर वे बाहर गेट पर जा खड़े हुए, जहां उनकी ड्यूटी थी।

माली ने मुझे घूर कर देखा। उस समय वह एक खुरपी लिए गुलाब की झाड़ियों के इर्द-गिर्द की घास साफ कर रहा था। उसने जब अपना काम बढ़ते देखा तो उसे बहुत क्रोध आया। चुपके से वह झाड़ियों के पास से उठा और भीतर अपने क्वार्टर से कोई मजबूत-सा डंडा लाने चला गया।

इतने में मैंने देखा कि पंडितजी बाग के बीचोंबीच सड़क पर चलते हुए, बल्कि दौड़ते हुए गुलाब के पौधे की ओर जा रहे हैं। मैंने यह अवसर उचित समझा और हिरन की तरह एक चौकड़ी भरी और पंडितजी के पीछ-पीछे हो लिया।

मैंने धीमे से कहा, ‘‘पंडितजी!’’

पंडितजी आश्चर्य से मेरी ओर मुड़े। जब उन्हें वहां कोई व्यक्ति दिखाई नहीं दिया तो फिर आगे बढ़ने लगे। मैंने फिर कहा, ‘‘पंडितजी!’’ अबकी पंडितजी ने जरा तीखी चितवन से पीछे देखा और बोले, ‘‘मैं भूतों में विश्वास नहीं रखता।’’

मैंने कहा, ‘‘विश्वास कीजिए, मैं भूत नहीं हूं, एक गधा हूं।’’

जब पंडितजी ने मुझे बोलते देखा तो उनका क्षण-भर पहले का आश्चर्य हर्ष में परिवर्तित हो गया। बोले, ‘‘मैंने इटली के एक घोड़े के बारे में पढ़ा था जो अलजबरा के प्रश्न तक हल कर सकता था। लेकिन बोलने वाला गधा आज ही देखा। मनुष्य का विज्ञान क्या कुछ नहीं कर सकता? बोलो, क्या चाहते हो? मेरे पास अधिक समय नहीं है।’’

मैंने कहा, ‘‘आपसे पंद्रह मिनट के लिए एक इंटरव्यू चाहता हूं। सोचता हूं, कहीं आप इसलिए इनकार न कर दें कि मैं एक गधा हूं।’’

पंडितजी हंस कर बोले, ‘‘मेरे पास इंटरव्यू के लिए एक से एक बड़ा गधा आता है, एक गधा और सही। क्या फर्क पड़ता है? शुरू करो।’’

मैं शुरू करने वाला था कि इतने में माली दूर से डंडा लिए भागता हुआ नजर आया। मैंने माली की ओर देखा, फिर पंडितजी की ओर। पंडितजी समझ गए। उन्होंने हाथ के इशारे से माली को रोक दिया और स्वयं टहलने लगे। मैंने रामू धोबी की दुख भरी कहानी संक्षिप्त शब्दों में सुना दी। पंडितजी बहुत प्रभावित हुए। कहने लगे, ‘‘इस मामले में सरकार कुछ नहीं कर सकती, मगर मैं अपनी जेब से एक सौ रुपया दे सकता हूं।’’

यह कह कर उन्होंने जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला और मेरे लंबे कान के भीतर उड़स दिया।

मैंने कहा, ‘‘पंडितजी! स्वर्गीय किदवई भी इसी प्रकार दान दिया करते थे। इससे सैकड़ों लोगों का भला तो जरूर हो जाता है लेकिन है तो यह दान ही।’’

बोले, ‘‘दान तो है।’’

मैंने कहा, ‘‘दान बंद होना चाहिए। हर भारतवासी का यह अधिकार होना चाहिए कि जब वह मरे तो उसके बाद राज्य उसके बीवी-बच्चों के निर्वाह का प्रबंध करे। इसे स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों में से एक होना चाहिए।’’

‘‘सिद्धांत तो ठीक है।’’ पंडितजी बोले, ‘‘लेकिन सिद्धांतों को व्यवहार में लाने के लिए खून-पसीना एक करने की जरूरत है। इसके लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं। वैसे तुम्हारी तरह लोग क्रांति की बातें बहुत करते हैं, लेकिन रामू धोबी की विधवा को पेंशन देने के लिए राष्ट्र के पास इससे कहीं अधिक राष्ट्रीय धन होना चाहिए, जितना आजकल उसके पास है। इस राष्ट्रीय धन को बढ़ाने के लिए हमने पंचवर्षीय योजना तैयार की है, जिसके आधार पर देश भर में काम हो रहा है, लेकिन लोगों में वह उत्साह नहीं, जिसकी मुझे आशा थी।’’

मैंने कहा, ‘‘लोगों में आपके प्रति असीम आदर है। आपकी बताई हुई योजनाओं से अत्यंत लगाव है। आपका हर आदेश उनके सिर-माथे पर होता है। आप संसार-भर में शांति स्थापित करने के लिए जो प्रयत्न कर रहे हैं, उसमें न केवल भारत के लोग, बल्कि समस्त देशों के लोग आपसे स्नेह करने लगे हैं।’’

पंडितजी मुस्कुराए, बोले, ‘‘गधे होने के बावजूद तुम बातें अच्छी बना लेते हो।’’

मैंने कहा, ‘‘आज मैं संसार के एक महान राजनीतिज्ञ के सामने खड़ा हूं। जाने फिर कभी ऐसा अवसर न मिले। इसलिए क्यों न अपने मन की बात आपसे कह डालूं। पंडितजी, आपकी वैदेशिक-नीति की सफलता सर्वमान्य है। राष्ट्रीय जीवन में भी आपकी स्वदेश-भक्ति जन-मित्रता और राष्ट्रीय सेवा से इनकार नहीं किया जा सकता। जो कोई ऐसा करेगा, मुंह की खाएगा। इस थोड़े-से समय में ही आप भारत को जिस शिखर पर ले गए हैं, उससे आपके कंधों की मजबूती का पता चलता है। लेकिन पंडितजी! क्या यह काफी है? एक राष्ट्र, एक बड़ा राष्ट्र, शूरवीर राष्ट्र, भारत ऐसा सभ्य राष्ट्र कब तक एक व्यक्ति के सहारे चलेगा ? क्या आप विष्वास से कह सकते हैं कि यदि आपने अपने शासन में उचित परिवर्तन न किए तो आपके बाद भारत की वही दशा न होगी जो अषोक और अकबर के बाद हुई थी?’’

‘‘अशोक और अकबर बादशाह थे। आज भारत में जनतंत्र है।’’ पंडितजी ने मुझे याद दिलाया।

‘‘केवल वोट से जनतंत्र नहीं होता। आज भारत में जो राज्य है, मैं उसे अधिक से अधिक नेहरु के आत्म-बलिदान के नाम से पुकार सकता हूं। आत्म-बलिदान सदैव व्यक्तिगत होता है। वह केवल एक व्यक्ति की ओर देखता है और जब वह व्यक्ति...व्यक्ति न रहे तो फिर क्या होगा? पंडितजी! मुझे इससे बहुत भय आता है।’’

‘‘मैं इस प्रश्न का उत्तर पहले ही दे चुका हूं।’’ पंडितजी ने कहा, ‘‘मैं नहीं समझता कि मेरे प्यारे देश की जनता मेरे बाद कोई इतना बड़ा नेता उत्पन्न नहीं कर सकती जो परिस्थितियों को संभाल न सके। मुझे अपनी जनता पर भरोसा है।’’

‘‘आपका भरोसा अनुचित नहीं लेकिन इसे व्यवहार में लाने के लिए भारतीय जनता की रचनात्मक शक्तियों को जगाने के लिए क्या यह जरूरी नहीं है कि इसके लिए अभी से कदम उठाया जाए? क्षमा कीजिएगा पंडितजी! मुझे आपके सरकारी अधिकारियों में कोई रामू धोबी, कोई जम्मन चमार, कोई ढोंढू मिल मजदूर नजर नहीं आता। कार वाले बहुत नजर आते हैं, गधे वाला एक भी नजर नहीं आता। अगर राष्ट्रीय धन को बढ़ाना है, अगर राष्ट्रीय योजनाओं को उत्तरोत्तर सफल बनाना है, अगर आप चाहते हैं कि देश की उन्नति दिन दूनी रात चौगुनी हो, तो इस राज्य-प्रणाली को बदलना होगा-ऊपर से नीचे तक। जनता के समस्त वर्गों को, समस्त स्तर पर, ऊपर से नीचे तक प्रतिनिधित्व देना पड़ेगा और एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार का निर्माण करना पड़ेगा, जिसमें देश की पूरी जनता-पूंजीपतियों से कांग्रेसियों तक और कांग्रेसियों से साम्यवादियों तक सब शामिल हों। केवल ऐसी सरकार ही देश में उत्साह की लहर दौड़ा सकती है। आज जो काम दस या पन्द्रह वर्ष में, बहुत-सी आर्थिक हानि और बहुत-सी रिश्वतखोरी के साथ होता है, कम से कम हानि और कम से कम रिश्वतखोरी और कम से कम समय में पूरा हो जाएगा। काम की गति बहुत बढ़ जाएगी, क्योंकि जनता हर स्तर पर राज्य-अधिकारियों में मौजूद होगी। इस समय मजदूरों से लेकर राज्य-मंत्रियों तक की एक ऐसी संगठित सरकार की अत्यंत आवश्यकता है।’’

पंडितजी मुस्कराए, बोले, ‘‘मैंने सोचा था तुम मेरा इंटरव्यू लोगे। मालूम होता है, तुम इंटरव्यू लेने नहीं, देने आए हो।’’

मैं घबरा कर चुप हो गया। बात सच कही थी उन्होंने।

मुझे चुप देख कर बोले, ‘‘नहीं-नहीं, कहो-कहो, मैं तो हमेशा से विद्यार्थी रहा हूं। मैं तो एक गधे से भी कुछ न कुछ सीख सकता हूं।’’

मैंने कहा, ‘‘मैं आपको क्या सिखाऊंगा! सूरज के सामने चिराग क्या जलेगा! लेकिन मैं चूंकि एक गरीब आदमी का गधा हूं, जीवन-भर भूख का शिकार रहा हूं, मुझे मालूम है कि जो दर्द आपके दिल में मौजूद है, वह हमारी दशा को, हमारी प्रतिदिन की दशा को देख कर ही आपके दिल में पैदा होता है। इसलिए जो बात आप कहते हैं, वह मानो हमारे दिल से निकलती है। लेकिन मुसीबत यह है कि आपके और हमारे बीच जो बाड़ लगाई गई है, जो मशीनरी खड़ी की गई है, वह अत्यंत प्रतिक्रियावादी, मंद गति से चलने वाली, बल्कि प्रायः आपकी अवज्ञा करने वाली है; इसलिए इस मशीनरी के भीतर जो शक्तियां काम करती हैं, वे हमारे विचारों की विरोधी हैं। अब तक जो काम होता है वह आपके भय से होता है। मुझे भय है कि जब आप हमारे बीच न होंगे, उस समय यह भय भी न रहेगा और वे लोग अपनी मनमानी कर गुजरेंगे- यदि अभी से इसके लिए प्रबंध न किया गया।’’

‘‘तुम्हारा मतलब मेरे साथियों से है ?’’

मैंने कहा, ‘‘जो साथी आपने लिए हैं और जो आपकी ‘सेकंड लाइन ऑफ डिफेंस’ हैं, वे आयु में और नेतृत्व में आपसे भी बूढ़े हैं और शायद आपसे पहले भुगत जाएंगे। मगर मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है, मेरा मतलब एक संगठित राष्ट्रीय सरकार की स्थापना से है। केवल ऐसी सरकार ही आगामी बीस-तीस वर्ष में भारत को आगे ले जा सकती है, जिसमें पूरे का पूरा राष्ट्र अपने विभिन्न वर्गों तथा तत्वों के साथ राष्ट्रीय हित तथा उन्नति के लिए सम्मिलित हो।’’

पंडितजी ने कहा, ‘‘मैं नहीं मानता, सरकार की मशीनरी मेरा साथ नहीं देती, कोई उदाहरण दो।’’

मैंने कहा, ‘‘जितने उदाहरण चाहे ले लीजिए। आप अपनी योजना में प्राइवेट सेक्टर को कम पब्लिक सेक्टर को अधिक रखना चाहते हैं, मगर प्राइवेट सेक्टर बढ़ रहा है और प्राइवेट सेक्टर में भी विदेशी धन बढ़ रहा है। जूट, चाय, बैंक-धन के अतिरिक्त अभी-अभी पच्चीस करोड़ रुपए की लागत से दो तेल की रिफाइनरियां खुली हैं।’’

‘‘हम उन पर पूरा कंट्रोल करेंगे।’’ पंडितजी ने क्रोध से कहा।

‘‘अगर एंग्लो-इरान कंपनी की तरह हमारा हाल हुआ तो ? कहीं ऐसा न हो कि उसे कंट्रोल करते-करते हमारा प्रधानमंत्री भी डा. मुसद्दिक की तरह क्षीण हो जाए।’’

‘‘तुम बिल्कुल गधे हो।’’ पंडितजी ने क्रुद्ध होकर कहा, ‘‘तुम पुराने क्लासिकल क्रांतिकारियों की-सी बातें करते हो भारत की विशेष परिस्थितियां नहीं देखते। यहां की जनता की विशेष मनोवृत्ति का अध्ययन नहीं करते। इनकी शांतिप्रियता तथा अहिंसा के प्रति गहरे प्रेम के प्रमाण नहीं देखते। यहां भारत में, काम धीरे-धीरे होगा। धीरे-धीरे समाज का ढांचा बदलेगा। धीरे-धीरे राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्यों का रूप बदलेगा। धीरे-धीरे इनमें सामाजिक लचक पैदा होगी, जो एक माॅडर्न समाज की विषेशता है। यह सब काम एक दिन में नहीं हो सकता। भारत में क्रांतिवादी शक्तियां भारत के विशेष राष्ट्रीय स्वभाव में समो कर और रच-बस कर ऊपर उभरेंगी। बाहर का पैबंद नहीं लगेगा। मैं तुमसे साफ-साफ कहे देता हूं, गधे! धीरे-धीरे सब काम होगा।’’

‘‘तब तक रामू की बीवी का क्या होगा? उन बच्चों का क्या होगा, जिन्हें इस देश में नौकरी नहीं मिलती, काम नहीं मिलता, जो विवश होकर इस देश से बाहर चले जाते हैं। फिर इस देश की बढ़ती हुई बेकारी का क्या होगा ? हर प्रदेश के आंकड़े देखिए; अभी थोड़े दिन हुए उत्तर प्रदेश की सरकार ने स्वीकार किया था कि उसके प्रदेश में बेकारी बढ़ रही है।’’

‘‘मेरे पास कोई छू-मंतर नहीं है कि एक दिन में भारत की दशा बदल डालूं। ऐसा आज तक किसी देश में नहीं हुआ है। पच्चीस-तीस साल से पहले देश की दशा इतनी जल्दी नहीं बदल सकती। हर देश का इतिहास यही कहता है। खून-पसीना एक कर देने से राष्ट्रीय धन तथा शक्ति बढ़ती है।’’ फिर मेरी पीठ पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तूने पंद्रह मिनट से अधिक ले लिए। अब मैं जाता हूं।’’

मैंने कहा, ‘‘पंडितजी! आपसे एक निवेदन है। संभव है इंग्लैंड में आपने गधों की सवारी की हो, लेकिन भारत में तो मैंने नहीं सुना कि आप गधे की पीठ पर सवार हुए हों। मेरा अहोभाग्य होगा अगर आप...’’

पंडितजी ने मुझे अपना वाक्य पूरा नहीं करने दिया। उचक कर मेरी पीठ पर बैठ गए और कुछ समय तक मुझे बाग के इर्द-गिर्द ऐसा दौड़ाया, ऐसा दौड़ाया कि मेरा सांस फूल गया। आखिर मैंने हार मान ली, ‘‘भगवान के लिए, पंडितजी, अब तो उतर जाइए।’’ मैंने बार-बार कहा।

वह हंस कर एकदम उतर पड़े, बोले, ‘‘अब बता! मंद गति से चलने वाला कौन है?’’

इसके बाद वह मेरी ओर से मुड़े और मैंने देखा कि बरामदे में कुछ विदेशी दूत और दो-एक फोटोग्राफर टहल रहे थे और पंडितजी की गधे की सवारी करने के फोटो ले रहे थे। दो-एक सेक्रेटरी लोग बड़ी परेशानी से टहल रहे थे। नेहरु जी मेरी पीठ थपकाकर उधर चले गए। जाते-जाते मुझसे कह गए, ‘‘उस धोबिन को वह सौ का नोट जरूर पहुंचा देना।’’

मैं बड़े गौरव से दुलकी चाल चलता हुआ पंडितजी की कोठी से बाहर निकला। क्यों न हो, आखिर भारत के प्रधानमंत्री से मुलाकात करके आया था। बाहर आते ही मुझे प्रेस के नुमाइंदों और फोटोग्राफरों ने घेर लिया।
(कृष्ण चंदर की ‘एक गधे की आत्मकथा’ से।)

Wednesday, November 4, 2009

कौन कहेगा ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं...’

राजू रंजन प्रसाद


कुछ साल पहले अस्पताल से लेकर कॉलेज तक की दीवारों पर लिखा होता था, ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।’ जनवादी और प्रजातांत्रिक मूल्यों के खिलाफ सांप्रदायिकता को बल प्रदान करने वाले एक से बढ़ कर एक लेखों के ढेर लगाए जा रहे थे। विकृत मानसिकता को तरजीह दी जा रही थी और बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों तक में सांप्रदायिक रंग भरे जा रहे थे। यह मानवीय मूल्यों और चेतना का संकट है। यह विचारों की स्वच्छता, आत्मा की पवित्रता और इन सबसे एक कदम आगे बढ़ कर एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के अस्तित्व का सवाल है। ऐसे में गांधीजी को याद करने का मतलब होगा सांप्रदायिकता विरोधी अभियान चलाना, हर ऐन मौके पर फिरकापरस्त ताकतों को शिकस्त देना, मात देना।

हालांकि कुछ लोग गांधीजी के सांप्रदायिकता संबंधी दृष्टिकोण के बारे में दूसरे ही तरह का खयाल रखते हैं। रजनी पाम दत्त जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों का मानना है कि ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपील करते हुए भी गांधीजी एक ऐसे राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं बोलते थे जो दोनों संप्रदायों में एक होने की भावना पैदा करता है। वह हिंदू नेता के रूप में बोलते थे, जो हिंदुओं को ‘‘हमलोग’’ कहता था, और मुसलमानों को ‘‘वे लोग’’।’

गांधीजी एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति थे। उनका धर्म लोगों से प्यार करने को कहता था, उनका धर्म उन्हें मानवता की पूजा करना बताता था। उनका धर्म कभी नहीं कहता था कि एक धर्म की रक्षा दूसरे धर्मावलंबी की हिंसा/हत्या के बाद ही हो सकती है। अहिंसा, सदाचार और अपने दुश्मनों तक को प्यार करने की नीति उनके धर्म के आदर्श थे। इस मायने में अगर कहा जाए तो वे एक सच्चे धार्मिक थे, एक संत थे, जिसकी मिसाल भारत क्या, इस पूरे संसार में भी बहुत कम ही है। अक्सर सांप्रदायिक दंगों के लिए धर्म को गुनहगार ठहराया जाता रहा है। लेकिन जब कभी सांप्रदायिक दंगों के मूल कारणों की खोज की दिशा में पहल होती है तो एक व्यापक संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक कारण ही हाथ लगते हैं।

धर्म तो मात्र एक बहाना है, जिसकी आड़ में स्वार्थी तत्त्व अपने हितों की पटरी बैठाते हैं। दंगे की जड़ में अगर धर्म होता तो गांधी निस्संदेह दुनिया के सबसे बड़े दंगाई या फिरकापरस्त होते। लेकिन यह क्या है कि भारत के किसी भी क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगा भड़क जाने पर यह विचार किए बगैर कि इलाका हिंदू का है या मुसलमान का, अमन कायम करने पहुंच जाते थे? कभी-कभी तो महीनों तक अन्न तक का त्याग कर देते।

सांप्रदायिक दंगों की जड़ में धर्म नहीं है, इसे स्पष्ट करते हुए गांधीजी ने एक बार ‘हरिजन’ में लिखा था- ‘मुझे लगता है कि सांप्रदायिक दंगे का कारण हिंदू-मुसलमान का आपसी विद्वेष नहीं है, बल्कि इसके कारण अंग्रेजी राज द्वारा जनता का शोषण, करों का भारी बोझ और इसी तरह के अन्य असंतोष हैं।

कुछ लोग गोकशी/गोहत्या को भी सांप्रदायिक दंगों का एक प्रमुख कारण मानते हैं। डॉ अखिलेश कुमार ने अपनी पुस्तक ‘कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडिया’ (दरअसल, यह काम बिहार के दंगों पर है, लेकिन प्रकाशक ने व्यावसायिक कारणों से ‘मॉडर्न बिहार’ की जगह ‘मॉडर्न इंडिया’ प्रकाशित कर दिया। यहां यह जोड़ देना मुनासिब है कि बिहार के दंगों पर यह संभवतः पहली और अकेली पुस्तक है।) में सप्रमाण दिखाया है कि गोकशी/गोहत्या कहीं से भी हिंदू-मुस्लिम विद्वेष का असली कारण नहीं है। अगर सवाल सिर्फ गोहत्या का होता तो हिंदू अंग्रेजों का भी विरोध करते क्योंकि गोमांस उनके भोजन में प्रमुखता से शामिल था। डॉ कुमार ने जोर देकर लिखा है कि गोकशी को लेकर हिंदुओं ने अंग्रेजों का कभी विरोध नहीं किया। यह सांप्रदायिक तनाव सिर्फ हिंदू-मुसलमान के बीच देखा जाता था। गांधीजी ने तो लिखा भी है- ‘मैं यह समझने में सदा असमर्थ रहा कि अंग्रेजों द्वारा की जा रही गोकशी का हम विरोध क्यों नहीं करते? हमारे गुस्से में इजाफा तब होता है, जब गोहत्या कोई मुसलमान करता है।’

यह सही है कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक दंगा के मामले में गांधीजी की दृष्टि बहुत साफ नहीं थी और हमें बहुत दूर ले भी नहीं जाती। इसका कारण शायद यह हो कि वे आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को एक सही संदर्भ में विश्लेशित कर पाने में असमर्थ थे। लेकिन इतना तो फिर भी मानना पड़ेगा कि धर्म को इसका कारण मानने के लिए वे तैयार न थे।

हिंदू-मुसलमान दोनों ही संप्रदायों के उच्च वर्ग के लिए गोकशी/गोहत्या कोई समस्या नहीं रही। इसको स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ शीर्षक लेख में लिखा था- ‘शायद ऐसे बहुत कम राजे-महाराजे या विदेश में शिक्षा प्राप्त करने वाले हिंदू निकलेंगे जो गोमांस न खा चुके हों। और उनमें से कितने ही आज हमारे नेता हैं, और हम उनके नामों का जयघोष करते हैं।’ कहना होगा कि पंडित मोतीलाल नेहरू भी कई मौकों पर गोमांस का स्वाद चख चुके थे। खुद गांधीजी ने स्वीकार किया है कि यूरोप प्रवास के दिनों में गोमांस खाते-खाते बचे। ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘गौरक्षिणी समिति’ की स्थापना से पहले गोकशी समाप्त करने पर उत्तर प्रदेश के एक स्कूल शिक्षक ने काफी जोर दिया है।

हिंदू-मुस्लिम दंगों की जड़ सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में निहित थी। प्रथम विश्व युद्ध के आसपास हिंदू-मुस्लिम दंगों का मुख्य कारण गोकशी/गोहत्या है। इस तरह के दंगों का केंद्र पशु मेला हुआ करता था। बिहार के ऐसे पशु मेलों में सोनपुर, बराहपुर और ऐनखांव के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हिंदू संप्रदाय के निम्न मध्य-वर्ग के लोगों के बीच ही सांप्रदायिक तनाव की स्थिति थी। संभवतः इन लोगों के बीच यह भ्रांत धारणा बैठा दी गई थी कि गोकशी/गोहत्या के कारण पशुओं की कीमत में वृद्धि हो जा रही है।

मुसलमानों के बीच निम्न मध्य-वर्ग के लोग चमड़े के व्यापार में लगे थे। गोहत्या पर पाबंदी से उनके व्यापार-व्यवसाय को धक्का पहुंचने का डर व्याप्त था। इसलिए गोकशी का संबंध धर्म से कम आर्थिक हितों से ज्यादा था।

इस नजरिए से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म कहीं से भी सांप्रदायिक दंगों या वैमनस्य का कारण नहीं है। हालांकि दंगा शुरू हो जाने के बाद अक्सर इसे ही मूल कारण का जामा पहना कर पेश किया जाता रहा है। यह हमारे सांप्रदायिक लीडरानों की करतूत है और अप्रत्यक्ष उनकी भी जो ‘धर्मनिरपेक्षता’ की ‘दुकान’ को जिंदा रखने में विश्वास रखते हैं। गांधीजी ने एक बार कहा था- ‘अगर हमारे नेतागण आपस में भाईचारा कायम कर लें तो शायद सांप्रदायिक तनाव खत्म हो सकता है।’ गांधीजी के इस वक्तव्य के दो अर्थ निकलते हैं। पहले अर्थ के बारे में कहा जा सकता है कि गांधीजी का यह अभिजातवर्गीय दृष्टिकोण था, जो सांप्रदायिकता की समस्या का हल राजनीतिज्ञों के हेल-मेल में ढूंढ़ता था। दूसरा अर्थ कहीं ज्यादा दुखद और अनर्थकारी है जो ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेताओं की पोल खोल देता है।

धर्म सांप्रदायिक दंगों का कारण नहीं है, लेकिन जनता की सदियों पुरानी एकता को भी तोड़ डालने का सबसे कारगर अस्त्र अवश्य है। बिहार राज्य अभिलेखागार के पॉलिटिकल स्पेशल फाइल नंबर 112/1918 में एक अत्यंत ही मजेदार घटना का हवाला दर्ज है। उसमें लिखा है कि दंगा करने वाले लोग ‘अंग्रेजी राज उठ गया’ और ‘जर्मन की जय’ के नारे लगा रहे थे। इस तरह की साम्राज्य-विरोधी चेतना को तोड़ने के लिए सरकार ने अनेक स्थलों पर प्रायोजित तरीके से मंदिरों-मस्जिदों को तुड़वाया। तब सीआईडी की रिपोर्ट आई कि जर्मनी और इंग्लैंड की समस्या से विरत हो लोग सांप्रदायिक दंगों में मशगूल हो चुके हैं। यह प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों की बात है।

बिहार के जहानाबाद जिले के अंतर्गत मथुरा सिंह नाम के एक विख्यात ‘हिंदू नेता’ थे। उनके बड़े लड़के ने ‘साक्षात्कार’ के क्रम में इस बात पर जोर दिया कि उनके पिता को मुसलमानों से कोई ऐतराज नहीं था, जबकि वे उस क्षेत्र के लगभग सारे दंगों में शामिल थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘उनके पिताजी कभी मुसलमानों का कत्ल करते तो कभी उसकी रक्षा भी करते, क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य कत्ल करना ही नहीं होता।’ दंगों के दौरान मंदिर-मस्जिद अगर आक्रमण का केंद्र बनते हैं तो इसका कारण शायद यही है कि वे धन-दौलत के साथ-साथ हथियार के भी केंद्र होते हैं। ‘गोल्डेन टेंपल’ इसका हाल का उदाहरण है।

गांधी और सांप्रदायिकता पर बात करते इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनके स्वभाव और आचरण के कुछ खास ऐसे नियम थे जिसके फलस्वरूप जनसाधारण मुसलमान के अंदर असुरक्षा का डर पैदा होता था। स्वराज्य की चर्चा करते गांधीजी ‘रामराज्य’ पर विशेष बल देते। ऐसा वे अपने ‘विशुद्ध धार्मिक’ संस्कारों की वजह से करते। लेकिन मुसलमान भाइयों को लगता कि वे आजाद भारत में ‘हिंदू राज’ की स्थापना की बात कर रहे हैं। मुसलमानों के एक अत्यंत ‘आधुनिक’ (धर्मनिरपेक्ष नहीं) नेता जिन्ना ने इस डर को व्यक्त करते हुए कहा था- ‘गांधीजी का लक्ष्य मुसलमानों की सभ्यता और संस्कृति को समाप्त कर भारत में हिंदू राज स्थापित करना है।’ आगे और भी कहते हैं- ‘उनकी मनसा ये नहीं है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ दिया जाए, बल्कि वे अंग्रेजों की देखरेख में मुसलमानों पर शासन करने की छूट पा लेने की कोशिश मात्र में हैं।’ यह कहना क्षम्य है कि गांधीजी के आचार-विचार के नियमों से सांप्रदायिक तनाव में वृद्धि हो जाया करती थी। लेकिन ‘गांधीजी की ऐसी मनसा थी,’ ऐसा कहना मनगढ़ंत, अनैतिहासिक और अनर्थकारी होगा।

जब-जब व्यवस्था-विरोधी संघर्ष तेज हुआ है, तब-तब भूख के मूल मसले को परे धकेल कर धर्म के मसले को सामने कर दिया जाता रहा है। कोई रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद लेकर आता है तो कोई इसके बंद ताले को ‘सरकारी कुंजी’ से खोलने की कोशिश करता है। मंदिर हो या मस्जिद- सभी मनुष्य के जीवन में मनुष्य के बाद ही स्थान पाने के हकदार हैं। लेकिन कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि गाय-सुअर, मंदिर-मस्जिद सभी बने रहेंगे, केवल इसके नाम पर अपनी जान देने वाले भोले-भाले हिंदू-मुसलमान न बचेंगे। और तब ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ के उदघोष के लिए कोई ‘हिंदू’ भी बचा न रह सकेगा।

Thursday, August 6, 2009

शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?




नवनियोजित शिक्षकों के आन्दोलन की खबरें बिहार के अखबारों में ‘प्रभात खबर’ ने सबसे शानदार तरीके से छापीं लेकिन ‘सुशासनी।’ डांट से अब ये ‘उल्टी गंगा बहाने’ लगे हैं। अनुराग कश्यप, दर्शक (लेखक हैं तो बुर्के में क्यों हैं?) और सुरेन्द्र किशोर इन शिक्षकों को अयोग्य साबित करने पर तुले हैं। शायद कोई ‘सरकारी फरमान’ मिला हो या कि ‘राजकीय पत्रकार’ नियुक्त होने के लिए ये लोग भी ‘दक्षता परीक्षा’ से गुजर रहें हैं। अनुराग कश्यप जी शिक्षकों को गुटखा-पान खाने वाला बता कर अयोग्य घोषित करना चाहते हैं। अगर योग्यता-अयोग्यता का यह भी एक पैमाना है तो न चाहते हुए भी कहना पड़ रहा है कि मद्यपान का प्रतिशत पूरी दुनिया में और खासकर बिहार में, किसी भी अन्य पेशे के लोगों से ज्यादा पत्रकारों में है। यहां तो ‘पियक्कड़’ होना एक अच्छा पत्रकार होने की पूर्व शर्त की तरह है। आप पत्रकार हैं तो मालूम ही होगा कि अधिक सिगरेट पीने वालों में एक नाम कार्ल मार्क्स भी है। मोतीलाल नेहरु ‘विदेशी दारू’ पीते थे। वाजपेयी जी के बारे में तो कभी आपने भी लिखा ही होगा। हिन्दी कविता के ‘सूर्य’ निराला हमेशा सोडा-वाटर के साथ पीते थे। नहीं तो नीट। पानी मिलाना उन्हें बिल्कुल गवारा न था। अलबत्ता कम आय वाले पत्रकार ‘ठर्रा’ से ही काम चलाते हैं। अनुराग जी सोचें कि क्या शराब पीने वाले पत्रकार अयोग्य हैं या कि सिर्फ अयोग्य पत्रकार ही पीते हैं? मेरे लिए तो अब भी यह योग्यता-अयोग्यता का पैमाना नहीं हो सकता।





पहले सुरेन्द्र किशोर और फिर अनुराग कश्यप लिखते हैं कि नवनियोजित शिक्षकों को आवेदन तक लिखने का ज्ञान नहीं है। उनके अनुसार ऐसे शिक्षक ‘स्टॉमेक में हेडक’ होने की बात लिख डालते हैं। अनुराग जी, पाठकों से छिपा नहीं है कि आप जैसे पत्रकार दफ़्तर में डेस्क पर बैठे-बैठे बगैर किसी शिक्षक से मिले पूरी की पूरी ‘स्टोरी’ गढ़ लेते हैं और अंत में लिख देते हैं ‘इस लेख में उल्लेख किए गए नाम बदल दिए गए हैं।’ मैं यह नहीं कहता कि शिक्षकों में कुछ अयोग्य लोग शामिल नहीं हैं। लेकिन क्या आप कोई ऐसा पेशा बता सकते हैं, जिसमें कुछ अयोग्य लोग न हों? कुछ साल पहले बिहार में व्याख्याताओं की नियुक्ति हुई थी। तत्कालीन गवर्नर को लगा कि इसमें बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है तो उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी। यही ‘सुशासनी मोदी’ थे जो गलत को सही करने के लिए नया गवर्नर लाए। उक्त नये गवर्नर ने अपने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद (तीन दिनों के अंदर) ‘अयोग्य व्याख्याताओं’ की नियुक्ति की। मामला विजिलेंस में गया और उस पर रिपोर्ट भी कई सालों से मुख्यमंत्री के टेबुल पर पड़ी है। यह रिपोर्ट व्याख्याताओं की ‘अदृश्य योग्यता’ के बारे में अनगिनत सबूतों से भरी पड़ी है। सरकार और उनके चाटुकारों को उनकी भी ‘योग्यता’ पर कुछ बोलना चाहिए। मुख्यमंत्री चुप हैं कि बोलेंगे तो उनकी भी ‘परीक्षा’ हो जाएगी।


इसलिए अनुराग जी, परीक्षा से सिर्फ नवनियोजित शिक्षक ही नहीं डर रहे, हमारे मुख्यमंत्री तक डरते हैं। हम शिक्षक अगर ‘स्टॉमेक में हेडक’ होने की बात लिखते हैं तो सचमुच चिंता का विषय है। इस पर सामूहिक विमर्श की जरूरत है। क्या आप नहीं मानते कि देश अथवा सभ्य समाज का नागरिक अखबारों और पत्रिकाओं के सहारे भाषा समृद्ध करता है और यह भी कि आजकल हिन्दी अखबारों की भाषा कितनी अशुद्ध हो गई है। यह कहते अच्छा नहीं लगता कि ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ लेना बंद करके बीच में कुछ दिनों के लिए मैंने ‘सहारा इंडिया’ अखबार लेना शुरु किया। एक माह के अंदर ही उसे बंद करना पड़ा क्योंकि बेटे ने ‘विद्रोह’ कर दिया। कहा - ‘पापा इसका एक वाक्य भी शुद्ध नहीं होता।’ परिवार की आंतरिक शांति को ध्यान में रखते हुए मैंने ‘सहारा इंडिया’ लेना बंद कर दिया। तभी ‘प्रभात खबर’ के संपादक अजय कुमार के यहां ‘उनका’ अखबार देखा। मुझे पसंद आया और कहूं कि पिछले दो माह से हिन्दी अखबार के नाम पर मैं ‘प्रभात खबर’ ही लेता हूं। लेकिन इसकी भाषा पर भी ध्यान देने की जरूरत है।


पत्रकारिता स्कूल के ‘द्रोणाचार्य’ सुरेन्द्र किशोर अगर ‘महत्त्वपूर्ण स्मरणीय बात’ लिखते हैं तो क्या भाषा भ्रष्ट नहीं होती? उन्हें खूब मालूम है कि महत्त्वपूर्ण बातें स्मरणीय होती हैं या फिर स्मरणीय बातें महत्त्वपूर्ण होती ही हैं। जून माह में आपके अखबार के एक अंक में किसी पत्रकार ने लिखा ‘ब्रिटिशवासी’ वह भी खबर के शीर्षक में, मोटे (बोल्ड)अक्षरों में। आए दिन आप छापते रहते हैं ‘पांच फीट चौड़ी सड़क।’ आप जानते हैं कि हिन्दी में फुट का ही प्रयोग चलता है फीट का नहीं। इसलिए महाशय, शिक्षक अपनी भाषा की दुर्दशा के लिए अकेले जिम्मेवार नहीं हैं। दूसरों की गलती दिखा कर आप बेदाग नहीं बच सकते।


कुछ समय पहले ‘बिहार राज्य अभिलेखागार’ में पुस्तक लोकार्पण समारोह था। शहर के ‘तोप’ बुद्धिजीवी वहां पधारे थे। ‘इतिहासवेत्ता’ हेमंत भी थे। मुख्यमंत्री को अशोक अंशुमान एवं श्रीकांत द्वारा ‘संपादित दस्तावेज’ का लोकार्पण करना था। तीन-तीन बैनर लगे थे, लेकिन किसी पर भी ‘मुख्यमंत्री’ शब्द सही तरीके से नहीं लिखा गया था। जाहिर है, इस कार्यक्रम के पीछे किसी नवनियोजित शिक्षक का हाथ नहीं था।


इसीलिए कहता हूं कि अनुराग जी, गिरावट आई है, लेकिन केवल नियोजित शिक्षक ही उसकी चपेट में नहीं हैं। हिन्दी अखबार का संपादकीय तक गिरावट की चपेट में है।

Monday, June 29, 2009

यादों में बसे लोग- 5


यथार्थ तो परछाई की तरह है...

कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है...

व्यथित जी जब कभी पटना आते और हमलोग मिल बैठते तो आलोक धन्वा की चर्चा अवश्य होती। आलोक जी की कविताओं से वे बेहद प्रभावित थे। वे जब बात करने लगते तो निर्दोष बच्चों-सी ललक दिख पड़ती उनमें। मैं कभी कहता कि ‘आपने आलोक धन्वा की सिर्फ कविताएं पड़ी हैं, जीवन नहीं देखा है’ तो हल्के-से प्रतिवाद से साथ बच निकलने की कोशिश करते। मुझे लगता वे अपना विश्वास नहीं तोड़ना चाहते और मैं चुप लगा जाता। लेकिन यथार्थ तो परछाईं की तरह है। उससे बहुत दिनों तक बचा तो नहीं जा सकता।

एक दिन की बात है कि अशोक जी को साथ लेकर व्यथित जी आलोक धन्वा से मिलने चले गए। वहां से लौटे तो बहुत उदास और अशांत थे। पूछने पर बताया कि ‘क्रांति के साथ निभ नहीं रही है। वे गुस्से में लगातार चीख के साथ बर्तनें तोड़े जा रही थीं।’ में यह सब सुन कर बहुत उदास और दुखी नहीं हुआ। ऐसी स्थित की आशंका मुझे पहले ही से थी। एकांत के क्षणों में आलोक धन्वा कहने लगे थे- ‘राजू भाई, मैंने दरवाजा खुला छोड़ रखा है। क्रांति जिस दरवाजे से होकर आई है, जा भी सकती है।’ मैं सोचता, लोग ठीक ही कहते हैं कि कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है। व्यथित जी इस घटना के बाद खासे डरे लग रहे थे। वे भी अपनी शादी लेकर गंभीर हो रहे थे, वह भी दूसरी के लिए।

साहित्य के जनतंत्र में...

इधर कुछ दिनों से आलोक धन्वा मुझसे नाराज थे। व्यथित जी की पुस्तिका ‘कविता का तीसरा संसार’ की समीक्षा को लेकर। यह जबलपुर से निकलने वाली अनियतकालीन पत्रिका ‘विकल्प’ में छपी थी। दरअसल, मैंने जो लिखा था, उसका सार यह था कि आलोक धन्वा के यहां मुक्तिबोध के उलट कविता और जीवन दो अलग-अलग चीजें हैं। समीक्षा को पढ़ कर या सुन कर आलोक धन्वा ने कुमार मुकुल से कहा था- ‘राजू बदतमीज और चूतिया है...।’ मुझे सहज ही विश्वास हो गया, क्योंकि कुमार मुकुल के बारे में मुझसे ठीक-ठीक यही वाक्य कहा था उन्होंने और यह भी कि ‘उसने मेरे घर में कागज-कलम पकड़ना सीखा है।’

आलोक धन्वा को ‘साहित्य के जनतंत्र’ में ‘असहमति’ मुश्किल से बर्दाश्त होती थी।

समीक्षा की आग मंद भी न पड़ी थी कि व्यथित जी पटना आ धमके। उन्हें उसी ‘विकल्प’ पत्रिका का नक्सलबाड़ी अंक संपादित करने का दाय्त्व दिया गया था। वे चाहते थे कि आलोक धन्वा का एक लंबा (ऐतिहासिक) इंटरव्यू हो पत्रिका के लिए। इस उद्देश्य से वे अपने नायक कवि के पास पहुंचे ही थे कि आलोक धन्वा बमक उठे। कहने लगे- ‘शर्मा जी, मुझे समझ में नहीं आता कि राजू जैसा पाजी लड़का आपका मित्र कैसे हो गया।’ शर्मा जी के ज्ञान पर चोट थी यह। इसलिए प्रतिवाद करने से अपने को रोक न पाए- ‘क्या मुझमें यह विवेक भी नहीं कि अपने मित्र का चुनाव मैं स्वतंत्र होकर कर सकूं?’ आलोक धन्वा को अपना दांव बेअसर होता लगा तो कहने लगे- ‘जहां से पहल जैसी पत्रका निकल रही हो वहां से विकल्प निकालने की क्या जरूरत है?’ महाकवि का इंटरव्यू करने की शर्मा जी की ख्वाहिश पूरी न हो सकी।

व्यथित जी अब भी पटना आते हैं, लेकिन आलोक धन्वा का नाम उन्हें उत्तेजित नहीं कर पाता।

‘क्रांति ड्रामा करने गई है...’

एक दिन मैं स्वरूप विद्या निकेतन स्कूल में अपनी कक्षा से ज्योंहि निकला तो पाया कि आलोक धन्वा निदेशक जनार्दन सिंह से बातचीत में उलझे हुए हैं। बहस का विषय था कि बच्चों को पीटा जाए या नहीं। जनार्दन सिंह जहां बच्चों को पीटने के लाभ बता रहे थे, वहीं आलोक उसे ‘सामंती समाज की देन’ बता रहे थे। दरअसल वे अपनी वकील भाई के बेटे को छात्रावास में दाखिला दिलाना चाहते थे। जनार्दन सिंह यानी बच्चों के स्वघोषित ‘चाचाजी’ को आलोक धन्वा सामंतों का लठैत घोषत कर चल निकले। मुझे भी साथ ले लिया।

रास्ते में नोटों की गड्डी दिखाते हुए कहा- ‘चलिए राजू भाई, आज पैसों की दिक्कत नहीं है।’ बेली रोड स्थित बेलट्रॉन भवन में कोई कार्यशाला चली थी, उसके पैसे थे उनके पास। मैं ‘न’ कह पाया और चल दिया। डाकबंगला के पास पहुंच कर एक साफ-सुथरी (महंगी भी) दुकान से ब्रेड और नाश्ते का अन्य सामान लिया। अपने घर के पास हरा चना भी खरीदा। हम दोनों घर में दाखिल हुए। मुझे ड्राइंग रूप में बिठा कर खुद एप्रन में बंधे किचेन में जा घुसे। हमलोगों ने साथ-साथ नाश्ता लिया। उन्होंने अपनी मशहूर काली चाय भी पिलाई।

थोड़ा निश्चिंत होने पर मैंने पूछा ‘घर में कहीं ‘क्रांति’ नहीं दिख रही है?’

थोड़ी देर मौन साध कर वे बोले- ‘क्रांति ड्रामा करने गई है।’

Wednesday, June 10, 2009

यादों में बसे लोग- 4

‘छत की लड़की’ से परिचय…

एक दिन अखबार से मालूम हुआ कि ‘छत की लड़की’ उनके आंगन में दाखिल हो चुकी है, यानी उन्होंने शादी कर ली है। हम लोगों के लिए यह खबर बहुत रोमांचक थी। मैं तब अशोक जी के साथ सुनील जी के मकान में रहा करता था। मैं, अशोक जी और सैदपुर छात्रावास के दिनों के पुराने परिचित सियाराम शर्मा व्यथित साथ-साथ आलोक धन्वा को बधाई देने पहुंचे। आलोक जी ने तीनों का बारी-बारी से पत्नी से परिचय कराया। अशोक जी के परिचय में उन्होंने ठीक-ठीक कौन-सा वाक्य कहा था, फिलहाल मुझे याद नहीं है। मेरा परिचय देते उन्होंने बताया- ‘आप राजू भाई हैं, मेरे पुराने प्रेमी और प्रशंसक।’ यह भी जोड़ा कि ‘ये मेरे एकांत के दिनों के साथी रहे हैं और समाजशास्त्र के विद्वान हैं।’ फिर व्यथित जी का परिचय दिया- ‘आप हिंदी के विद्वान और साहित्य के गंभीर आलोचक हैं।’ तब तक सियाराम जी की आलोचना पुस्तिका ‘कविता का तीसरा संसार’ पहल पत्रिका से प्रकाशित होकर आ चुकी थी। इसमें आलोक धन्वा वीरेन डंगवाल और कुमार विकल की कविताओं की समीक्षा थी। हालांकि अपने साथ गोरख पांडेय को पाकर आलोक धन्वा सियाराम जी से थोड़ा नाराज भी थे। कवियों की जमात में ‘गीतकार’ का शामिल करना शायद आलोक को अच्छा न लगा था।

खैर, तो अब आलोक अपनी पत्नी का परिचय देने वाले थे। उन्होंने अभिनय की मुद्रा बनाते हुए कहा- ‘आप हैं क्रांति भट्ट। बैट (बिहार आर्ट थियेटर) की प्रख्यात अदाकारा। और फिलहाल ये कंप्यूटर से खेल रही हैं।’ हमलोगों को काफी देर की मगजमारी के बाद मुश्किल से मालूम हुआ कि स्थानीय ‘आज’ अखबार के कंप्यूटर विभाग में नौकरी करती हैं।

"क्रांति तो मेरी बेटी के समान है..."

शादी के बाद जब कभी आलोक धन्वा से मिलने जाता तो वे काफई व्यस्त हो जाते। खिड़कियों और कमरों के परदे दुरुस्त करते और कहते जाते- ‘राजू भाई, अब मैं पारिवारिक हो गया हूं न!’ मेरे मन को थोड़ा विनोद सूझता और मन ही मन बोलता- आलोक धन्वा ने ‘पारिवारिक’ होने में इतना समय लिया है, पता नहीं ‘सामाजिक’ बन भी पाएंगे या नहीं। साथ बैठे होने पर पत्नी को अक्सर ‘बच्ची’ संबोधित करते। बातचीत के क्रम में सहज ही कह जाते ‘क्रांति तो मेरी बेटी के समान है, बच्ची है।’ पत्नी को बेटी बनना पसंद न था और आलोक धन्वा थे कि उसे बेटी बना कर पिता का असीमित अधिकार हासिल कर लेना चाहते थे।

‘कुलीनता की हिंसा’…

वे क्रांति की सामान्य दिनचर्या की छोटी-से-छोटी चीज में दखल देते और अपनी बात पास करवाना चाहते। मसलन, उसे कब दही खाना चाहिए और कब नहीं, इस तक का भी वे ‘खयाल’ रखते। क्रांति का नाटकों के लिए घर से बाहर निकलना अब उन्हें अखरता था। एक दिन वे मुझसे कहने लगे- ‘राजू भाई, क्रांति रघुवीर सहाय की कविताओं का मंचन करने जा रही है। आप तो जानते हैं कि रघुवीर सहाय की कविताओं में अद्भुत नाटकीयता है। उसका निर्वाह क्रांति से संभव न हो सकेगा। इसलिए मैंने तो कह रखा है कि रघुवीर सहाय की कविताओं का मंचन करने जाओंगी, तो मेरे सीने से गुजर कर जाना पड़ेगा। मैं हिंदी कविता का अपमान सहन करने के लिए जीवित नहीं रह सकता।’ एकबारगी मेरी आंखों के सामने ‘कुलीनता की हिंसा’ का बिंब जीवित हो उठा। क्रांति तो गईं, लेकिन आलोक जीवित रह गए।