Friday, April 3, 2009
यादों में बसे लोग- 1
बीएन कॉलेज में इतिहास ऑनर्स का छात्र था जब पहली बार आकाशवाणी, पटना में सुलभ जी से मिला। रेडियो पर लेख पढ़ना चाहता था- भक्ति आंदोलन का सामंत विरोधी स्वर। सुलभ जी ने उसे उलट-पलट कर देखा और कहा- 'राजू जी, व्यवस्था बहुत कम शब्दों को जानती है।' उनके इस एक वाक्य ने मुझे काफी प्रभावित किया। फिर और बातें होने लगीं। मेरे प्रिय कवि के बारे में भी पूछा। मैं भूला नहीं हूं कि मैंने आलोक धन्वा का नाम लिया था। आगे उन्होंने एक किताब दी- 'धूप की एक विराट नाव।' हरेकृष्ण झा की काव्य पुस्तिका, जो मध्यप्रदेश की 'साम्य' पत्रिका की तरफ से मुद्रित हुई थी। मैंने इसे स्वीकार किया और दो-तीन दिनों में समीक्षा जमा कर दी। कविताएं चूंकि राजनीतिक थीं, इसलिए अमूमन मैंने राजनीतिक विश्लेषण ही किया। यह और बात है कि हरेकृष्ण झा ने उसकी तारीफ की और देर तक बातचीत की। पता चला, झा जी के नक्सलबाड़ी आंदोलन के साथ कभी गहरे रिश्ते थे।
वे सब प्रतिबद्धता की फसल काट रहे थे...
शायद बीए का ही छात्र था, जब आरक्षण को लेकर देशव्यापी हंगामा हुआ था। पूरे देश के छात्र समर्थन और विरोध में बंटे हुए थे। इस मुद्दे को लेकर मैं भी अपने मित्रों के बहस छेड़ दिया करता था। एक दिन जोर-जोर से कॉलेज कैंपस में बोल ही रहा था कि दो अपरिचित सज्जनों ने मुझसे थोड़ा एकांत में चलने का आग्रह किया। भीड़ से अलग हुआ और एक औपचारिक परिचय के बाद फिर नए सिरे से बातचीत में भिड़ गया। सज्जनों में इरफान काफी बौद्धिक छटा बिखेरते थे। उनकी बातचीत का अंदाज काफी गंभीर और बौद्धिकतापूर्ण था, हालांकि उन्होंने सिगरेट भी सुलगाई थी। मुझे भी शरीक किया।
बातचीत के क्रम में पता चला कि वे लोग 'समकालीन जनमत' पत्रिका की तरफ से थे। स्टोरी के लिए मैटर का जुगाड़ बिठाने और क़ॉलेज में आंदोलन की तासीर जानने आए थे। दोनों ने मुझे रामजी राय और प्रदीप झा से मिलने की सलाह दी। मिला भी। इस परिचय के बाद हमलोगों ने नियमित मिलना-जुलना जारी रखा। विष्णु तो अक्सर कम बोलते थे, लेकिन इरफान मुझे अक्सर इस बात के लिए कोंचते थे कि 'मैं पार्टी में नहीं हूं, इसलिए प्रतिबद्ध नहीं हूं।' उनका अत्यंत प्रिय सूत्रवाक्य था कि 'जो पार्टी का कैडर नहीं है, उसकी क्रांतिकारिता पर भरोसा नहीं किया जा सकता।' वैसे सीपीआई (माले) का सिंपेथाइजर अवश्य था, लेकिन पार्टी का बंधन मानने को मन तैयार न था। प्रेमचंद का यह वाक्य कहीं पढ़ रखा था कि 'मेरी पार्टी अभी बनी नहीं है।' उसी तर्ज पर मैं भविष्य की पार्टी का इंतजार कर रहा था।
कहना होगा कि इस मेलजोल के साथ ही मन में दुराव का भाव भी पैदा हो रहा था। लोगों के रहने के तरीके को लेकर कभी-कभी मैं हैरान और चिंतित हो उठता। इरफान सदैव मोटरसाइकिल से ही चलते और हर आधे घंटे पर विल्स सिगरेट फूंकते। मुझे लगता यह पार्टी के पैसे का दुरुपयोग है। एक दिन थोड़ी खीझ होने पर मैंने कह दिया था- 'इरफान, अगर प्रतिबद्धता का यह मतलब है तो इस कीमत पर मैं प्रतिबद्ध नहीं हो सकता।' माले के लड़कों में सिगरेट की बड़ी भारी लत थी। अपने 'गॉडफादर' विनोद मिश्र की नकल हो शायद! रंजीत अभिज्ञान भी तब पटने में बहुत सिगरेट पीता था और हमेशा चंदे के नाम पर लोगों से पैसे लेता था और भागा फिरता। नए लड़कों में नवीन और अभ्युदय बहुत सिगरेट पीते हैं। संगठन का पीते हैं, यह नहीं कह सकता।
समकालीन जनमत का विष्णु, इरफान और चंद्रभूषण वाला ग्रुप 'श्रेष्ठतबोध' की भावना से भरा हुआ था। एक शाम मैं टहलते हुए महेंद्र सिंह के शास्त्रीनगर वाले फ्लैट पर पहुंचा, जहां वे लोग स्थायी तौर पर रहा करते थे, तो पाया कि सभी किसी गंभीर विमर्श में फंसे हैं। मैंने भी कुछ कहने की हिम्मत (जुर्रत!) की तो तीनों मुझे कुछ इस कदर घूरने लगे, मानों आंखों ही आंखों में मुझे बता रहे हों कि यह आपके बूते की चीज नहीं है। वे लोग 'दि सेकेंड सेक्स' पर बातें कर रहे थे। माले का यह हिरावल दस्ता 'सेक्स' को भरपूर जीता था। पार्टी के अंदर 'सेक्स स्कैंडल' और यौन शोषण की कम किंवदंतियां नहीं हैं।
इसी क्रम में फरवरी, 1990 में मेरी शादी होनी तय हुई। जनमत के इस ग्रुप से मैंने शादी में शरीक होने के लिए आग्रह किया। कार्ड दिया ही था कि इरफान ने कहा, 'चलो, एक और जीवन नष्ट हुआ।' खैर, वे लोग वहां पहुंचे। कमलेश शर्मा भी उनलोगों के साथ थे। लड़की वाले की तरफ से निवेदिता थीं। मेरे बड़े भाई के साले अमरेंद्र कुमार भी थे। अमरेंद्र का मैंने जनमत के लोगों से परिचय भी कराया। इरफान ने अमरेंद्र से दार्शनिक अंदाज में पूछा- 'आपको सबसे ज्यादा कौन-सी चीज आतंकित करती है?' अमरेंद्र ने बिल्कुल अपने स्वभाव के अनुकूल जवाब दिया- 'पेड़ से पत्तों का गिरना।' अमरेंद्र कुमार को आज भी मैं इसी बिंब के साथ याद करता हूं यह जवाब इरफान के लायक भी था। सुना है, आजकल वे सब प्रतिबद्धता की फसल काट रहे हैं...।
Saturday, March 14, 2009
भारतीय संस्कृति और दिनकर की आर्य दृष्टि
"आर्यत्व" अगर कुछ है...
बीसवीं शती पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी प्रति-औपनिवेशिक चेतना अथवा प्रत्याख्यान रचने और विकसित करने की सदी रही है। इस सदी में भारत दो तरह के महायुद्ध में शामिल था। एक का स्वरूप सांस्कृतिक था तो दूसरे का राजनीतिक। दोनों एक दूसरे को पुष्ट करते अथवा जल प्रदान करते थे। सांस्कृतिक चेतना के उन्मेष-काल में भारतीयता की खोज जोर-शोर से शुरू हो चुकी थी। पूर्वी और पाश्चात्य दोनों ही ओर के विद्वान इस गंभीर कर्म को अंजाम देने में लगे थे। इस क्रम में भारत की जो तस्वीर बन रही थी वह काफी कुछ मिश्रित किस्म की थी। विदेशी लेखकों में ऐसे कई थे जिनके दिमाग में यह राष्ट्र अजीब-सी चीजों का मिश्रण था- सपेरों, नटों और रहस्यवादियों का देश। इनकी राय में भारत की सामान्य जनता घोर आध्यात्मिक जीव थी जो पेड़ की पत्तियां चबा कर और हवा पीकर गुजारा करती थी। विद्वानों का एक दूसरा वर्ग भी था जो इसकी प्रति-छवि रचने में रत था। विदेशी विद्वानों के साथ कई देशी विद्वान भी इस कर्म में लीन थे। नेहरू, निराला, दिनकर सभी भारत की खोज की रोमांचक यात्रा पर निकल चुके थे। लेखकों में नेहरू और दिनकर ने भारत को समग्रता में देखने की कोशिश की परंतु कहना होगा कि भारत को सबसे अधिक समग्रता में और स्पष्टता के साथ अकेले नेहरू ही देख सके।
दिनकर ने भारतीय इतिहास और संस्कृति को चार अध्यायों में बाँटकर देखा है जो भारतीय संस्कृति के चार अध्याय हैं। उन्हीं के शब्दों में लगभग दो वर्षो के अध्ययन के पश्चात् मेरे सामने यह सत्य उद्भासित हो उठा कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियाँ हुई है और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रांतियों या इतिहास है। पहली क्रांति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आये अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियो से संपर्क हुआ। आर्यो ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की वही आर्यो अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यो के दिए हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है। दिनकर का "आर्यत्व" (अगर ऐसा कुछ होता हो) इतना ही कहने से संतुष्ट न हुआ। इसलिए आगे वे और बढ़-चढ़कर लिखते हैं, असल में, भारतीय जनता की रचना आर्यो के आगमन के बाद ही पूरी हो गई और जिसे हम आर्य या हिन्दू सभ्यता कहते हैं, उसकी नींव भी तभी बाँध दी गयी। आर्यो ने भारत में जातियों और संस्कृतियों का समन्वय किया, उसी से हमारे हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति का निर्माण हुआ।
दिनकर का भारतीय समाज-संस्कृति विषयक मूल्यांकन कई कारणों से गड़बड़ हुआ जान पड़ता है। अब्बल तो भारतीय संस्कृति का सत्य उद्भासित होने के लिए दो वर्षो का अध्ययन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। मतलब यह कि अपने अत्यंत गंभीर कर्म के लिए दिनकर ने यथोचित ‘होमवर्क’ नहीं किया। दूसरे, जब वे हमारे हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति कहते हैं तो आर्यो अथवा हिन्दूओं के साथ उनका एकात्मक संबंा जाहिर होता है। यही कारण है कि हिन्दू सभ्यता और विशेशकर आर्यो पर बात करते हुए वे एक संस्कृति चिंतक कम, उसके पैरोकार ज्यादा हो जाते हैं। यह दूहराना अनावश्यक सा प्रतीत होगा कि इतिहास वस्तुनिष्ठता और उससे भी ज्यादा निर्ममता की माँग करता है। सदास्था के लिए शायद यहाँ कोई जगह नहीं होती। अपने आरंभिक दिनों में दिनकर इतिहास के विधिवत छात्र रहे थे इसलिए उन्हें इतिहास की क्रूरता का अंदाजा तो होगा ही। अलबŸाा उससे सीख नहीं ली। हीगेल का कोई अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा हो।
शुद्धता की चिंता और काले होते आर्य...
प्रस्थान बिन्दु यह है कि भारत में आर्यो का आगमन कई दृष्टियो से एक पिछड़ा हुआ कदम था। वे भारत में अर्थ-विचरणशील पशुचारियों के रूप में आये थे। उनका निर्वाह मुख्यतः पशु-उत्पादनां से होता था और कुछ समय तक पशुपालन ही उनका मुख्य व्यवसाय रहा। अतएव पशुओं के लिए चारागाह की खोज में वे भ्रमणशील होते। एक जगह टिककर जीने की आर्यो ने न तो अबतक कला सीखी थी और न ही उसने इसकी कभी जरूरत महसूस की थी। कृषि-कर्म के अभाव ने एक जगह जमने की उनकी बाध्यता ही समाप्त कर रखी थी, बल्कि शहरें, दुर्गो और स्थायी बनी बस्तियों को वे नष्ट कर रहे थे। आर्य संस्कृति की बात करते हुए हमें ध्यान में रखना चाहिए कि संस्कृति का शहर से कोई रिश्ता बनता है अथवा नहीं। भारतीय इतिहास में हुए शोधों-गवेषणाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक जमाने के आर्यो की कोई समरूप संस्कृति विकसित न हो सकी थी। पुरातत्व विज्ञान की भाषा में कहें तो उनके अपने कोई विशिष्ट प्रकार के वर्तन, औजार अथवा हथियार न थे। ऐसा कुछ भी न था जिसे आर्यो के साथ जोड़ा जा सके। भारत की भूमि पर आने के बाद आर्यो को जो कुछ भी हाथ लगता गया, उसे अपना बनाते गये।
सबसे दुखद और हास्यास्पद बात तो यह है कि उनकी अपने कहलाने वाली औरतें की आबादी में बहुत थोड़ी ही थीं। वैदिक देवताओं में कई ऐसे हैं जिन्हें आजीवन अविवाहित रहने का अभिशाप झेलना पड़ा है। आर्य देवता भी अधिकतर पुरुष हीं हैं, पर कुछ देवियाँ पहले के युगों से और पहले के लोगों से ली गई जान पड़ती है। यह बात भी मतलब से खाली नहीं है कि आर्यो के जीवन में झगड़े का अवसर मुख्य रूप से गायों एवं स्त्रियों की चोरी के कारण पैदा होता है। रामायण में सीता-हरण और महाभारत में भीष्म द्वारा तीन-तीन औरतों को उठा ले जाने की बात वैदिककालीन परिस्थितियों की स्मृति रही होगी। हमारे प्राचीन महाकाव्यों के ‘वीर’ स्त्रियों को उठाये अथवा चुराये बगैर ‘नायक’ घोषित नहीं हो सकते थे। जो ‘स्वंयवर’ की प्रथा के बहाने स्त्रियों की आजादी की बात करते हैं वे बताएँ कि एक स्त्री को प्राप्त करने के लिए हजारों की भीड़ में जो आपसी कठिन प्रतिदृंदिता होती थी वह किस बात की तरफ इशारा करती है। वर्णश्रम नियमों की सख्ती के बावजूद अनुलोम विवाह की सुविधा छोड़ रखी गई थी। रक्त की शुद्वता की तमाम चिंता एवं दावों के बावजूद गोरे आर्य काले होते जा रहे थे। आर्यो का यह भारतीयकरण अथवा अनार्यीकरण दिनकर को आर्य संस्कृति का फैलाव नजर आता है।
कहना होगा कि यह अकेले दिनकर की परेशानी नही है। दरअसल, भारत एवं यूरोप दोनो ही जगहों पर आर्यों को केन्द्र मे रखकर इतिहास लेखक का काम होता रहा है। इसमें यह भावकी काम करता रहा है कि हम आर्य जाति की संतान हैं। इसका स्वाभाविक नतीजा यह हुआ कि आर्यो से ताल्लुक रखनेवाली प्रत्येंक चीज को महिमा मजिल करने का रिवाज चल पड़ा। उदाहरण के तौर पर स्वयं आर्य शब्द को लिया जा सकता है। इस शब्द का सबसे पुराना अर्थ धुमन्तू अथवा पशुचारी या कि खानाबदोश रहा होगा। आर्य शब्द की व्यूत्यपित विद्वान तर धातु से बताते हैं और गमनार्थक/गत्यर्थक प्रयोग करते है। आर्य जब खेती करना सीख गये होगे तो पुरानी व्यत्पति से काम चलाना मुश्किल हो रहा होगा अतएव अट् धातु से इसे व्युप्तन्न बताया जाने लगा। अट् धातु का मतलब खेती करने से लिया गया। तब भी आर्य शब्द में "श्रेष्ठ" का भाव नही आया था। यह निश्चित रूप से आर्यो के विकासक्रम में अगले चरण का कमाल रहा होगा। इस चरण में आकर आर्य श्रेष्ठता बोध से भर गया। निश्चित रूप से यह वह काल रहा होगा जब सामाजिक स्तरीकरण तीखा और वर्ग-विभेद की जड़े गहरी हो रही होगी। इन तथाकथित श्रेष्ठ जनों की भाषा भी संस्कृत कहलायी "प्राकृत" अथवा "अपभ्रंश" नही। समाज में जब श्रेष्ठ और "हीन" लोगों का बँटवारा हो गया तो भाषा की दुनिया में भी एक लकीर खींच दी गई। संस्कृत को श्रेष्ठ भाषा का दर्जा दिया गया और प्राकृत को हीन भाषा का। यहाँ इस बात का रखने और विस्तार में जनों की शायद जरूरत नही है कि दोनों ही श्रेणी के लोगों के लिए सख्त हिदायत भी दी गई कि वे भासक अपनी ही भाषा का प्रयोग करें।
आर्य संस्कृति और दिनकर का अवैज्ञानिक बोध...
मजे की बात है कि आर्य केवल भारत में नही श्रेष्ठ घोषित हुए, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में जिन्हें प्रथम दर्जे का नागरिक बनाया गया क्योंकि उन देशों में उनकी संतानों मौजूद थी। आर्यो के एक बडे़ उद्वारक मैक्स मूलर हुए। वे जर्मनी के रहनेवाले थे। वहाँ प्राचीन आर्य चिह्नों की पूजा होती रही है। हिटलर उसी का दम भरता था। इरान को तो सीधे-सीधे आर्य शब्द से जोड़ ही दिया गया है। बताया जाता है कि इरान की उत्पति "आर्यानामा" अर्थात आर्यों का देश से हुई है। क्या यह महज संयोग है कि मनुष्यों में आर्य श्रेष्ठ हुए और भाषाओं में आर्यमय भाषा-परिवार! यह एक स्थापित तथ्य है कि भारत के चारों भाषा परिवारों में सबसे ज्यादा काम आर्य भाषा-परिवार पर हुआ है।
आर्य संस्कृत बोलते थे कह सकते है कि संस्कृत बोलने वाले लोग आर्य (श्रेष्ठ) कहे जाते थे। इसलिए अकारण नही है कि आर्यों के साथ-साथ उसके द्वारा बोली जानेवाली भाषा संस्कृत के मामले में भी विद्धानों के बीच मुग्द्यता की स्थिति बनी रही है। इस भाषा की समृ़ित के गीत गाते विद्धान कभी नही थकते। खासकर वेदों की भाषा का वर्णन वे इस अंदाज में करते हैं मानो उसने विकास सारी मंजिले पार कर ली हों। दुनिया की किसी भी भाषा के क्रमिक विकास के चरणों एवं चिह्नों को स्पष्टता के साथ देखा-दिखाया जा सकता है। दुनिया की अन्य सभी भाषाओं की तरह संस्कृत का विकास बोल-चाल की भाषा से हुआ हैं इसके पर्याप्त संकेत वेदों की भाषा में देखने को मिलेगें। अगर आप गौर करें तो तो पायेंगे कि संस्कृत भाषा का विकास सामान्य से विशेष अर्थ की ओर, अनिश्चिता और व्यापक अर्थ से निश्चित और सीमित अर्थ की ओर हुआ हैं। उदाहरण के बतौर मृग शब्द को लिया जा सकता है जिसका मूल अर्थ पशु था जो मलमालम में आज भी सुरक्षित है, लेकिन संस्कृत में सामान्य अर्थ से विशेष अर्थ की ओर भाषा की प्रगति को कारण इसका अर्थ एक विशेष पशु हो गया।
वास्तव में मृग का मूल अर्थ का जिसे ढूँढा जाता था इसलिए उनकी संज्ञा मृग पड़ गई थी। मृगया में शिकार संबंधी अर्थ और मृगेन्द्र, मृगराज (पशुओं का राजा, सिंह) शाखा मृग में पशुमात्र का अर्थ अब भी सुरक्षित है। इस बात की संभावना है कि बर्बरता, वीरता या साहस के शिथिल हो जाने के कारण मनुष्यों ने भयंकर पशुओं की अपेक्षा हरिणों का शिकार करना आरंभ कर दिया हो। शिकार में अब केवल हरिण को ही ढूँढने के कारण मृग संज्ञा उनके लिए रूढ़ हो गई। यहाँ हमारा जोर इस बात पर है कि वैदिक संस्कृति अथवा आर्यों का संस्कृति की जो भौतिक एवं भाषिक संपदा है वह अपने विकास के शैशवकाल में हैं, निर्माण के क्रम में है। कहना होगा कि आर्य जिन-जिन चीजों के और जैसे-जैसे संपर्क में आ रहे है, उसकी अलग से पहचान कर रहे हैं और सबकों एक नया शब्द और नया अर्थ दे रहे है। एक समय था जब लगभग शताधिक चीजों के लिए महज एक शब्द ‘गो’ से काम चलाया जाता था। हैंरत अंग्रेज बात तो यह कि संस्कृति के पुरोधा अर्थात स्वयं मनुष्य के लिए भी कभी-कभी मृगशब्द ही से काम चलाया जा रहा है।
सार यह है कि भारत में आर्यो के आगमन से क्रांतिकारी परिवर्तन इस वजह से संभव न हुआ कि वे अपने साथ एक अंत्यत विकसित भाषा एवं भौतिक संस्कृति साथ लाए थे। ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि तुलना में आर्य लोग ईसा पूर्व की तीसरी सहस्त्राब्दी की उन महान नगरी में संस्कृति से श्रेष्ठ नही थे जिनपर उन्होने हमला किया और जिन्हें प्रायः नष्ट कर डाला। वस्तृतः जिस बात के लिए के लिए इन लोगों को विश्व इतिहास कि में इतना महत्व मिला है, वह थी इनकी बेजोड़ गतिशील, जो इन्हें मवेशियों के चल खाद्य-भंडार के रूप में, युद्ध में अश्व-रथ के रूप में और भारी माल ढोने के लिए बैलगाड़ी के रूप में प्राप्त हुई थी। इनकी मुख्य उपलब्धि यह थी कि इन्होंने ईसा पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी की महान नदी घाटी सभ्यताओं से दूर बसी हुई, अवरूद्ध तथा प्रायः पतनोन्मुख कृषक बिरादरियों के बीच के अवरोधों को बड़ी निर्ममता से नष्ट कर डाला।
साधारणतः आर्य और आर्य-पूर्व लोगों के मेल-जोल से नई आर्य भाषा के साथ, नई बिरादरियाँ बनीं। आर्यो में नया सीखने की अदम्य लालसा की जो उनके बड़ी काम आई। आरंभिक आर्यो में आर्य-पूर्व लोगों की भौतिक एवं भाषिक संस्कृति को अपनाने में न तो कोई हिचक है न झिझक। भाषा में इसके प्रमाण है आर्यो द्वारा दूसरी भारतीय भाषाओं से लिए गए शब्द। लेकिन आर्य संस्कृति के बारे में दिनकर की जो अवधारणा है उसके मूल में यह अवैज्ञानिक बोध है कि आर्य एक उन्नत एवं समृद्ध संस्कृति व भाषा के साथ आए और भारत की अन्य भाषाओं-संस्कृतियों को अधीन कर गये। अंग्रेजी उपनिवेशवाद से लड़ते हुए दिनकर लगता है जाने-अनजाने आर्य अथवा हिन्दुत्व का उपनिवेशवाद रचने की सीमा तक चले गये थे। आज विमर्श के इस नये दौर में ऐसी तमाम चीजों पर एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि रखनी होगी तभी हम इतिहास की क्रूरता से किसी राष्ट्र अथवा जाति को बचा सकेंगे।
Monday, March 2, 2009
मुझे मेरे समानधर्मा की तलाश है...
बीसवीं शती पूरी दुनिया के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शती रही है। शायद इसलिए कि इसने मानव-जीवन में कुछ महान कही जा सकने वाली तब्दीलियां पैदा की। लोगों ने भविष्य की घोषणा को इतिहास बनते देखा है। मार्क्स ने समाजवाद का जो सपना (इसमे और भी लोग शामिल थे) देखा था, वह बहुत-कुछ पूरा भी हुआ और टूटा भी। हमारा आधुनिक मन इस पूरी परिघटना से जुड़ा रहा है। इधर सौ-डेढ़ सौ साल के साहित्य पर अगर नजर डाला जाए तो लगता है कि कहीं न कहीं से यह उसके असर मे है।
तो आओ मेरी कविता में
नंगे पांव चल कर
पारकर तप्त रेतीले मैदान
कि हों फोड़े, पड़े छाले, रिसे बूंद खून की
तो दिखे साफ तुम्हारा
अपना ही चेहरा।
Saturday, January 24, 2009
संस्कृति और इतिहास-बोध- 3
परंपरा को ताबीज बना कर रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि न तो वह संपूर्ण सुंदर है, न नितांत असुंदर। उसमें सक्रियता भी है, प्रमाद भी। स्वार्थ भी है, परमार्थ भी। संकीर्णता भी है, उदारता भी। इसलिए कालिदास का यह उदगार कि पुराणमियत्येव न साधु सर्व- जो समय के बोध से सना है, हमेशा याद रखने लायक है। परंपरावादियों के लिए तो और भी, क्योंकि अतीत का उनका यह कथन हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा हो चुका है। और जो वर्तमान समय में भी शायद उतना ही सटीक है।
लेकिन कहना होगा कि अपनी ही किस्मत से कालिदास ने कोई खास नसीहत नहीं ली। उन्होंने उन्हीं वर्णाश्रम अर्थों की कीर्ति बखानी जो भारतीयता पर कालिमा का टीका सिद्ध हो चुके थे। अलबत्ता कहीं-कहीं रोष अवश्य प्रकट किया है। उनकी शंकुतला पुरुष के अधिकारों पर व्यंग्य करती है, उनकी सीता वाच्यं त्वया मदवचनात्स राजा कह कर राम को संदेश भेजती है। लेकिन वास्तव में यह विद्रोह नहीं, विद्रोह की विडंबना है। शूद्र तपस्वी शंबूक के राम द्वारा रघुवंश में मारे जाने पर महाकवि की लेखनी में बल तक नहीं पड़ता, वह खुद उस तपस्वी को उसके अनाचार पर धिक्कारता है। कालिदास का इतिहास-बोध विरोध कई बार आत्म-प्रताड़ना तक को जन्म देता दिखता है
धूत करो अवधूत करो जैसी पंक्ति वही लिख सकता है, जिसने अपने नथूनों में वर्ण-व्यवस्था की सड़ांध महसूस की हो।
संस्कृति की यह गतिशील व्याख्या इतिहास-बोध और काल की मर्यादा से प्रेरित है। या कह सकते हैं कि तात्कालिकता का दबाव है।
Saturday, January 17, 2009
संस्कृति और इतिहास-बोध- 2
संस्कृति प्रवहमान होती है... संस्कृत के क्षेत्र में इस तरह के अलगाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब विकास की एक खास यात्रा हम तय कर चुके होते हैं। उससे पहले शायद ऐसा करना संभव भी नहीं होता। हम इतिहास के अनुभवों के आधार पर देखें तो साफ होगा कि जिस आर्य या वैदिक संस्कृति पर हम गर्व करते हैं, वह अपने प्रारंभिक दिनों में ऐसी कुछ भी नहीं थी। बल्कि कहना होगा कि आर्यों का भारत आगमन इसीलिए एक पिछड़ा कदम था। इसलिए अपने शुरुआती दिनों में आर्यों को जहां कहीं कुछ बेहतर मिलता, अनुकरणीय लगता। उसे वे अपनाने में तनिक संकोच नहीं करते। यहां तक कि दूसरों की पत्नियों और देवता तक को अपना डालते थे। आर्यों को भारतीय प्रदेशों में औरतों की कमी महसूस हुई होगी, क्योंकि लंबी यात्रा में कुछ मृत्यु को प्राप्त हुई होंगी। नतीजतन आर्यों के कई देवता तक बगैर पत्नी के जीवन गुजारने का अभिशप्त हैं। गोरे आर्यों की काली संतानें पैदा हो रही हैं। काले ऋषियों की उस दौर में बाढ़ है।
इन्हीं बातों को लिखने के लिए मुक्तिबोध की पुस्तक "भारतः इतिहास और संस्कृति" की प्रतियां जला दी गईं। आर्य-रक्त की शुद्धता का दावा करने वाले लोगों को भारतीय संस्कृति का यह विमर्श अच्छा नहीं लगता। इससे श्रेष्ठता और शिष्टता वाला भाव जाता रहता है. वे संस्कृति को एक अत्यंत गोलमटोल अर्थ में लेना चाहते हैं। जबकि संस्कृति की अनंत परतें हैं। एक साथ कई रूपों और कई धाराओं में संस्कृति प्रवहमान होती है। इन धाराओं की आपसी टकराहट और सम्मिलन की प्रक्रिया में ही संस्कृति जीवंत बनती और संवर्धित होती चलती है। जिस संस्कृति और कौम में टक्कर और आत्मसातीकरण की प्रक्रिया नहीं चल रही होती या ठप पड़ जाती है, उसका नष्ट होना तय होता है। इतिहास-बोध से संपन्न व्यक्ति को मालूम होता है कि मानव जाति द्वारा निर्मित ऐसी कितनी ही संस्कृतियां काल के गर्भ में विलीन हो गईं, क्योंकि समय की धारा को अपने अंदर समाहित नहीं कर सकीं।
संस्कृति अपने को कई रूपों में व्यक्त करती है। परंपरा और रीति-रिवाज इनमें प्रमुख हैं। जिस तरह एक बहुलतावादी समाज में संस्कृतियों की बहुलता होती है, उसी तरह परंपरा की भी बहुलता होती है। कई परंपराएं एक ही काल में जीवित होती हैं। इनकी आपसी टकराहट से ही नवीनता का उन्मेष होता है। संस्कृति को एक निश्चित ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने का मतलब एक स्वस्थ और समग्र दृष्टिकोण पैदा करना होता है।
यानी किसी देश या जाति की संस्कृति की अध्ययन या उसकी आलोचना प्रस्तुत करते हुए हमें मुख्य रूप से दो बातों- निरंतरता और परिवर्तन को चिन्हित करने का प्रयास करना होता है। निरंतरता और परिवर्तन की इस प्रकिया में परंपरा संस्कृति की स्मृति होती है। जिस तरह प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी स्मृति है, ठीक उसी तरह संस्कृति अपनी परंपराओं में बसती है। मनुष्य की स्मृति में सब कुछ कैद नहीं होता। बहुत कुछ छोड़ते जाते हैं और नया ग्रहण करते जाते हैं। संस्कृति भी परंपरा का त्याग करती जाती है और नवीनता का अंगीकार।
यहां इतिहास-बोध यह निर्णय देता है कि परंपरा हमेशा न तो त्याज्य है और न ही नवीनता हमेशा ग्राह्य। कालिदास जब "मालविकाग्निमित्र" में कहते हैं कि जो पुराना है वह सभी सुंदर नहीं है और न नया मात्र नया होने से ही निंद्य है, तो इसी बात को वे भिन्न तरीके से कह रहे होते हैं। यह कालिदास का इतिहासजनित विवेक ही है, जो परंपरा और नवीनता के बीच फर्क की पहचान करता है।
Saturday, January 10, 2009
संस्कृति और इतिहास-बोध- 1

संस्कृति पर विमर्श प्रकारांतर से मानव जाति पर विमर्श है, क्योंकि इसके केंद्र में वही है। अपने व्यापकतम अर्थ में संस्कृति वह सब है, जिसका निर्माण मानव जाति ने किया है और कर रही है- श्रम के औजारों से लेकर घर-गृहस्थी की वस्तुओं तक, रीति-रिवाजों और रहन-सहन के ढंग से लेकर विज्ञान और कला, धर्म और अनीश्वरवाद, नैतिकता और दर्शन तक, केवल इतना ही कहें तो संस्कृति की हमारी अवधारणा या परिभाषा एकांगी, और साथ ही साथ भ्रामक भी होगी। इसलिए इतना भर याद रखना जरूरी है कि मानव संस्कृति का रचयिता है और साथ ही उसकी रचना भी। ऐसा करते या मानते हुए हम अपना इतिहास-बोध जाग्रत कर रहे होते हैं। यानी यह इतिहास का विवेक है जो हमें बताता है कि मानव जाति संस्कृति का केवल रचयिता ही नहीं है, बल्कि खुद उसी की निर्मिति भी। और हमारा इतिहास-बोध भी ठीक-ठीक इसी रूप में संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
अगर संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो यह संस्कृत के बहुत पास मिलेगा। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है शिष्ट और सभ्य। जो शिष्ट या सभ्य नहीं है, प्राकृत है, जंगली है। बर्बरता संस्कृति की परिधि से बाहर की चीज है। जंगल-युग हमारी संस्कृति का पोषक नहीं, क्योंकि इस लिहाज से यह विकास की एक खास अवस्था को पार कर शुरू और निर्मित होती है। संस्कृत शब्द में संस्कार, संशोधन या परिष्कार का भाव जुड़ा हुआ है। एक दूसरे तरीके से कहें तो अलगाव का भाव जन्म ले रहा है। संस्कृत को प्राकृत से अलग करने की मुहिम शुरू हो चुकी है। भाषा के क्षेत्र में भी इसके गणित बिठाए जा रहे हैं। संस्कृत सिर्फ शिष्ट और सभ्य लोगों की भाषा बनी।
लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि संस्कृत नाटकों में शूद्र और स्त्री प्राकृत भाषा का व्यवहार करते हैं। संस्कृत केवल संभ्रांत वर्ग के लोग ही बोल पाते थे। वे इसका हवाला भर देकर शात हो लेते हैं। वे कभी नहीं कहते कि निम्न वर्ण और स्त्रियों के लिए संस्कृत भाषा का व्यवहार सिद्धांत रूप में भी वर्जित था। नाट्यशास्त्र का लेखक भरत मुनि इसका प्रमुख सिद्धांतकार है। भारत के इतिहास में यह वह काल है जब वर्चस्व की संस्कृति पैदा हो रही थी।
यहां हम यह भी कह सकते हैं कि संस्कृत में वर्चस्व का भाव रहा है। वरना जिस देश में कुत्ता, सियार और हाथियों तक के लिए संस्कृत संबोधन है, वहां मनुष्य जाति के एक बड़े वर्ग को संस्कृत बोलने से क्यों कर रोका जा रहा है? आज भी महावत हाथी के साथ गच्छ, तिष्ठ जैसे संस्कृत शब्दों के ही सहारे संवाद कायम करता है। आज भी हमारे कुत्तों के नाम भले अंग्रेजी ढर्रे पर रखे जाने लगे हों, उनके संबोधन में उच्चारित शब्द अत्तु संस्कृत का ही है। संस्कृत भाषा के जानकार जानते हैं कि यह आदरार्थ प्रयुक्त है। यानी आदर (सम्मान) में कहा गया शब्द, जिसका भाषिक अर्थ है- "आइए खाइए।"
Friday, December 26, 2008
धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 4
धर्म प्रगतिशील हो ही नहीं सकता...
भारत में मार्क्सवादियों को गुमान रहा है कि धर्मनिरपेक्षता की ध्वजा के असली वाहक वे ही हैं। इनके यहां धर्मनिरपेक्षता की "सर्वधर्म समभाव" की अवधारणा के विपरीत अवधारणा है, जिसमें "धर्म जनता के लिए अफीम है।" धर्म को "अछूत" मान कर मार्क्सवादियों ने अपने को सेक्युलर साबित करने की भयंकर कोशिश की। उनके लिए धर्म सेक्युलरिज्म के रास्ते में बाधा थी। धर्म के विरोध के नाम पर उन्होंने जनता का ही विरोध करना शुरू कर दिया। नतीजतन, जनता का इनसे संवाद खत्म हो गया।
सोवियत संघ में आए संकट के बाद "बुद्धिवादी" मार्क्सवादियों के बीच धर्म की भूमिका को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ी। अब उनका जोर धर्म के दूसरे पहलू पर है- यानी धर्म की प्रगतिशील भूमिका अब इनके लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। दुर्भाग्य की बात है कि इस बार भी मार्क्सवादियों ने धर्म के सिर्फ आधे-अधूरे यथार्थ को ही पकड़ा।
धर्म की प्रगतिशील भूमिका से किसी को भला को क्यों एतराज हो सकता है। हमें भी नहीं है। लेकिन रोना तो सिर्फ इस बात का है कि प्रगतिशीलता के नशे में चूर होकर उन अंतर्विरोधों की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता जो सीधे तौर पर धर्म के अपने निजी अंतर्विरोध के कुफल हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात करते वक्त हमें धर्म की आंतरिक संरचना पर एक बार गंभीरता के साथ ध्यान देना होगा, वरना एक बार फिर हम सारे मार्क्सवादी अपनी राय को अत्यंत सरलीकृत ढंग से पेश करने के लिए दोषी माने जाएंगे।वामपंथियों की धर्म के बारे में जो राय थी, यानी "धर्म अफीम है", निष्कर्ष के तौर पर काफी सही थी। दोष सिर्फ विश्लेषण की पद्धति का था, जिससे हम आज भी बच नहीं पाए हैं। वही निष्कर्ष आज भी सही है। इसलिए धर्म के सिर्फ प्रगतिशील पक्ष पर ध्यान केंद्रित करना आसन्न खतरे को और नजदीक ले आना होगा, क्योंकि धर्म को आधार बना कर धर्म निरपेक्षता की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।
धर्मनिरपेक्षता के लिए हमें धर्म के खिलाफ लड़ना ही होगा। इस खतरे के साथ कि संभव है, जनता से हमारा संवाद बंद हो जाए। संवाद को निरंतर कायम रखने के लिए उनके पास धर्म के अलावे और भी कई दुखती रगें हैं, जिन पर उंगलियां रखी जा सकती हैं। धर्म को राजनीति के साथ जोड़ने का स्वाद हम देश के विभाजन के रूप में चख चुके हैं। अब और इसे लंबा ले जाने की ताकत हममें नहीं रही।